HomeAntarvasna Hindi Sex Storiesससुराल वालों ने रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में

ससुराल वालों ने रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में

ससुराल वालों ने रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में अन्तर्वासना हिंदी ग्रुप सेक्स स्टोरी का सारांश :- रेखा की शादी विक्रम से होती है और ससुराल पहुँचते ही वह शादी के बाद की रस्मों और परंपराओं के चलते ससुर हरिप्रसाद, जेठ विजय तथा देवर राकेश के साथ मिलकर ग्रुप चुदाई की जंगली दुनिया में उतरती है। शादी के बाद की रस्मों और परंपराओं को निभाने के दौरान विक्रम की बिना कंडोम वाली पहली पेलाई से गर्भ ठहरता है, पर नौ महीने तक ससुराल के चार मर्द उसे रंडी बनाकर चूत, गांड और मुंह में लंड ठूँसते रहते हैं।

रस्मों और परंपराओं की आड़ में हर रात घंटों का फोरप्ले – जीभ की चाट, मुट्ठी की घुसेड़, बेल्ट की मार, थूक-वीर्य की बौछारें। गर्भवती रेखा को बाँधकर, दीवार से सटाकर, फर्श पर पटककर, छत पर लटकाकर चारों तरफ से पेला जाता है। गंदी गालियाँ – बहनचोद, मादरचोद, रंडी, कुल्टा, हरामी – हवा में गूँजती हैं। थीम है ससुराल की कामुक रस्म, गर्भ में ग्रुप हार्डकोर, दर्द को सुख में बदलना, और रेखा का कुल्टा बनकर ससुराल की स्थायी रखैल बनना। हर दृश्य लंबा, वर्णनात्मक, क्रूर और उत्तेजक – चार लंड, एक गर्भवती बुर, अनंत वासना।


मैं रेखा हूँ, 26 साल की नवविवाहित औरत, जिसकी शादी विक्रम से हुई और ससुराल पहुँचते ही मेरी चूत की किस्मत बदल गई। शादी की तीसरी रात थी, कमरा अँधेरा, सिर्फ एक बल्ब की पीली रोशनी। विक्रम ने दरवाजा बंद किया, मेरी लाल साड़ी का पल्लू खींचा और फर्श पर गिरा दिया। “आज से तू मेरी रंडी है,” उसने गरजकर कहा और मेरे ब्लाउज के हुक तोड़ दिए। ब्लाउज फटते ही मेरे बड़े भारी स्तन बाहर आकर लटक गए, मेरे मोटे मोटे बूब्स के निप्पल पहले से ही कड़े हो रखे थे सुहागरात की चुदाई के बारे में सोच सोचकर। उसने मुझे दीवार से सटाया, मेरी साड़ी कमर तक लपेटी, पैंटी एक झटके में फाड़ी। उसका 9 इंच का काला, मोटा लंड मेरी आँखों के सामने किसी काले सांप के जैसे लहरा रहा था।

मैंने लंड को पकड़ने के लिया अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन उसने मेरे हाथ पीछे कर दिए और अपना लंड मेरी चूत के होंठों पर रगड़ना शुरू कर दिया। “तेरी चूत तो बहुत ज्यादा गीली हो गई साली रंडी,” उसने हँसते हुए कहा। मैंने सिसकारी भरी, “विक्रम, धीरे… आज ये मेरा पहला सेक्स है” लेकिन उसने एक जोरदार धक्का मारा और आधा लंड मेरी चूत के अंदर पेल डाला। दर्द से मेरी आँखें फटीं की फटी राह गयी, मैं दर्द के मारे जरो से चीखी, “मादरचोद, फट जाएगी!” उसने मेरे बाल खींचे, “चुप रंडी, ले पूरा!” और बाकी लंड एक और धक्के में गायब। मेरी चूत में जलन, लेकिन 2 मिनट बाद लय बन गई। वह मेरे कुल्हे पकड़कर जोर-जोर से पेलने लगा, दीवार से मेरी पीठ टकराती रही। मेरे स्तन उछल रहे थे, वह एक हाथ से उन्हें मसलता, निप्पल चुटकी से मरोड़ता।

ससुराल वालों ने रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में अन्तर्वासना हिंदी गैंग बैंग ग्रुप सेक्स स्टोरी

ससुराल वालों ने रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में अन्तर्वासना हिंदी गैंग बैंग ग्रुप सेक्स स्टोरी - Sasural walon ne randi bana diya rasmon aur paramparaon ki aad mein - My in-laws turned me into a whore under the guise of rituals and traditions Gang Bang Group Sex Story
My in-laws turned me into a whore under the guise of rituals and traditions – Hindi Gang Bang Group Sex Story

मैं कराह रही थी, “हाँ बहनचोद, पेल अपनी बीवी को!” उसने सेक्स करने के दौरान मेरी चूत फाड़ने के लिए चुदाई करने की स्पीड बढ़ाई, मेरी चूत से चाप-चाप की आवाजें आ रही थीं जो बैडरूम के माहोल को और भी ज्यादा सेक्सी बना रही थी। 15 मिनट बाद उसका लंड फूल गया, “ले रंडी, बच्चा ठहरवा!” और गर्म वीर्य की पिचकारियाँ मेरी गर्भाशय में। वह निकला नहीं, कुछ देर अंदर ही रखा, फिर बाहर निकाला तो वीर्य की धारा मेरी जाँघों पर बहने लगी। उस रात उसने तीन और बार चोदा, हर बार चूत में झड़ा। अगले महीने डॉक्टर ने कहा, “गर्भ है।” विक्रम ने मुझे गोद में उठाया और कहा, “अब ससुराल की असली रस्म शुरू।”

ससुर हरिप्रसाद 55 साल के थे, मोटे, सफेद दाढ़ी, लेकिन लंड 7 इंच का सख्त। जेठ विजय 35 साल, जिम ट्रेनर, 10 इंच का मोटा रॉड। देवर राकेश 22 साल, कॉलेज स्टूडेंट, 8 इंच का पतला पर तेज। तीनों की नजरें मेरे उभरे पेट पर टिकीं। चौथी रात विक्रम ने कहा, “रेखा, ससुराल में बहू सबकी साझा होती है।” मैंने डरते हुए पूछा, “क्या मतलब?” उसने मुस्कुराकर दरवाजा खोला। ससुर, विजय और राकेश अंदर आए, सबके हाथ में रस्सियाँ और बेल्ट। कमरे में चारपाई पर मैं नंगी लिटाई गई, हाथ-पैर बाँधे गए। ससुर ने अपनी लुंगी उतारी, मोटा लंड मेरे चेहरे पर थपथपाया। “बहू, आज से तू हमारी कुल्टा है,” उसने कहा।

विजय ने मेरे स्तनों को मुट्ठी में लिया, जोर से दबाया, दूध की बूँदें निकलीं। “देखो, गर्भवती बुर कितनी रसीली,” उसने हँसते हुए कहा। राकेश ने मेरी चूत के होंठ फैलाए, दो उंगलियाँ अंदर घुसाईं। मैं सिहर उठी, “राकेश, धीरे…” लेकिन विक्रम ने बेल्ट उठाई और मेरे कुल्हों पर पहला कोड़ा मारा। जलन की लहर दौड़ी, मैं चीखी, “मारो मादरचोद, अपनी रंडी बहू को सजा दो!” दूसरा कोड़ा चूत पर पड़ा, मैंने कमर उचकाई। विजय ने अपना 10 इंच का लंड मेरे मुंह में ठूँसा, गले तक।

मैं दम घुटने लगा, थूक बहने लगा। ससुर ने मेरी चूत में अपना मोटा लंड घुसाया, “ले कुल्टा, दादाजी का आशीर्वाद!” राकेश ने गांड में उंगलियाँ, फिर अपना लंड टिकाया। विक्रम बेल्ट से मारता रहा। चारों तरफ से हमला – मुंह में विजय, चूत में ससुर, गांड में राकेश, कुल्हों पर विक्रम की बेल्ट। मैं चीखती-कराहती रही, लेकिन 10 मिनट बाद दर्द सुख में बदल गया। मेरी चूत से पानी की फव्वारे निकलने लगे। विजय ने मेरे गले में झड़ा, मैंने वीर्य निगला। ससुर ने चूत में, राकेश ने गांड में। विक्रम ने आखिर में मेरे चेहरे पर। मैं वीर्य से लथपथ, लेकिन संतुष्ट।

अगली रात किचन में मुझे मेरे ससुराल वालों ने रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में। मैं सब्जी काट रही थी, विक्रम ने पीछे से आकर मेरी साड़ी ऊपर की। “रंडी, खाने से पहले चुदाई,” उसने कहा। विजय ने मुझे टेबल पर झुकाया, ससुर ने आगे से ब्लाउज फाड़ा, राकेश ने पीछे से पैंटी नीचे। विजय ने अपना मोटा लंड मेरी चूत में एक झटके में घुसाया, मैं चीखी, “बहनचोद, फाड़ दिया!” ससुर ने मुंह में, राकेश ने गांड में। विक्रम ने बेल्ट से मार मारकर मेरे कुल्हे लाल किए। टेबल हिल रही थी, सब्जियाँ बिखर गईं। विजय के लंड की मोटाई से मुझे मेरी चूत फटती महसूस हुई, लेकिन मैंने कुल्हे पीछे धकेले। “हाँ जेठजी, पेलो अपनी भाभी को आज रंडी बनकर!” ससुर मेरे गले को चोद रहा था, उसका पेट मेरे माथे से टकरा रहा था। राकेश की स्पीड तेज, गांड में आग। 25 मिनट बाद सबने जगह बदली – अब ससुर चूत में, विजय गांड में, राकेश मुंह में। मेरी चूत से खून जैसा लाल पानी बहा, लेकिन मैं चिल्लाई, “और तेज मादरचोदों!” अंत में सबने चूत में झड़ा, मैं स्क्वर्ट करके बेहोश सी हो गई।

पाँचवाँ महीना। पेट उभरा, स्तन भारी। ससुर ने रस्मों व परंपराओं की आड़ में नया खेल शुरू किया – सुबह की मुंह चुदाई। मैं घुटनों पर, चार लंड बारी-बारी गले तक। ससुर पहले, फिर विजय, राकेश, विक्रम। “नाश्ते से पहले वीर्य पी कुल्टा!” मैं निगलती रही, थूक-वीर्य का मिश्रण मेरे चेहरे पर। शाम को मुख्य सेशन। छत पर, रात 1 बजे। मुझे रेलिंग से बाँधा, हाथ ऊपर, पैर फैलाए। ठंडी हवा मेरी चूत को सहला रही थी। विजय पीछे से गांड में, ससुर सामने चूत में, विक्रम मुंह में। राकेश कैमरा चला रहा था। “सबको दिखाओ ससुराल की गर्भवती रंडी!” विजय गरजा। दोनों तरफ से धक्के, मेरी कमर झूल रही थी। मैं चीखी, “हाँ हरामियों, पेलो अपनी बहू को!” पड़ोस की लाइट जली, लेकिन कोई नहीं रुका। 45 मिनट तक डबल पेनिट्रेशन, मेरी चूत और गांड दोनों फट गईं। विजय ने गांड में झड़ा, ससुर चूत में। विक्रम ने मुंह में, राकेश ने चेहरे पर। मैं लटकी रही, वीर्य की बूँदें नीचे टपक रही थीं।

गर्भावस्था के छठे महीने की जंगली रातें – डबल चूत पेनिट्रेशन, बंधक मुट्ठी खेल और ससुराल की क्रूर रस्मों की गहराई

मेरी गर्भावस्था का छठा महीना लग चूका था। विजय और विक्रम ने चूत में डबल पेनिट्रेशन का प्लान बनाया। मुझे चारपाई पर लिटाया, पैर ऊपर। विजय नीचे लेटा, अपना 10 इंच का लंड चूत में घुसाया। फिर विक्रम ऊपर से, अपना 9 इंच का। मैं चीखी, “नहीं, फट जाएगी!” लेकिन दोनों ने जोर लगाया। दो लंड एक साथ, मेरी चूत की दीवारें खिंच गईं। दर्द असहनीय, लेकिन 3 मिनट बाद मैंने खुद कुल्हे हिलाने शुरू कर दिए। “हाँ बहनचोदों, फाड़ दो अपनी गर्भवती रंडी की बुर!” ससुर गांड में, राकेश मुंह में। चारों एक साथ। मेरी चूत से खून और पानी मिलकर बह रहा था। विजय और विक्रम की स्पीड अलग-अलग, कभी एक अंदर, कभी दूसरा। मैं पागल हो गई, “और तेज मादरचोदों!” 40 मिनट तक। अंत में दोनों ने चूत में झड़ा, वीर्य की नदी बही। ससुर गांड में, राकेश मुंह में। मैं बेहोश।

मेरी गर्भावस्था का सातवाँ महीना प्रारंभ हो चूका था। ससुर ने रस्मों व परंपराओं की आड़ में मेरी गांड और चूत के अंडार मुट्ठी डालकर हस्तमैथुन करने का नया खेल शुरू किया। मुझे बाँधा, आँखें पट्टी। ससुर ने थूक लगाकर मुट्ठी बनाई, धीरे-धीरे चूत में घुसाई। मैं चीखी, “ससुरजी, फाड़ दोगे!” लेकिन वह रुका नहीं, आधी मुट्ठी अंदर। घुमाई, खींची, फिर पूरी। मेरी चूत ने मुट्ठी निगल ली। विजय ने गांड में मुट्ठी, राकेश ने निप्पल पर क्लैंप लगाए। विक्रम बेल्ट से मारता रहा। दर्द चरम, लेकिन मैं स्क्वर्ट कर फर्श भिगो दिया। “हाँ हरामियों, अपनी कुल्टा बहू को मार डालो!” फिर ग्रुप – मैं लटकी हुई, चारों नीचे। लंड घुसेड़ते रहे, जगह बदलते रहे। घंटा भर।

आठवाँ महीना प्रारंभ हो चूका था मेरी गर्भावस्था का और अब मेरा बच्चा मेरे पेट के अंदर हिलता हुआ महसूस होने लगा था। ससुर कहता, “बच्चा भी सीखेगा दादाजी का लंड कितनी मस्त चुदाई करता है उसकी माँ की।” गर्भावस्था में भी मैं चुदाई करवाने के लिए फर्श पर घोड़ी बना करती थी। विजय चूत में, ससुर गांड में, विक्रम मुंह में, राकेश हाथ। धक्के इतने जोरदार कि बच्चा किक मारता। मैं हँसती-चीखती, “हाँ मादरचोदों, बच्चे को हिलाओ!” विजय की मोटाई से चूत फूल गई, ससुर की गांड पेलाई से आँसू। लेकिन मैंने खुद कुल्हे पीछे धकेले। 50 मिनट तक। वीर्य की बौछारें।

गर्भावस्था के नौवें महीने का महाक्लाइमैक्स – चार लंडों की अंतिम तबाही, गर्भवती रेखा की चूत-गांड-मुंह की पूर्ण समर्पण रस्म

गर्भावस्था का नौवाँ महीना प्रारंभ होते ही अब मेरा पेट बहुत विशाल दिखने लगा था। अब मेरे ससुराल के सभी मर्द मेरे साथ मेरी गर्भावस्था के दौरान का आखिरी गैंग बैंग ग्रुप सेक्स करने वाले थे। गर्भावस्था के दौरान की अंतिम सुहागरात के लिए मेरे बैडरूम को ठीक वैसे ही सजाया गया जैसे मेरी सुहागरात के दिन सजाया गया था। में भी बिलकुल दुल्हन की तरह सजी थी। पहले फोरप्ले – चारों जीभ, उंगलियाँ, मुट्ठी। ससुर चूत में मुट्ठी, विजय गांड में, राकेश-विक्रम स्तन चूसते। दूध निकलता, वे पीते। मैं तड़पती, “अब लंड दो बहनचोदों!” फिर मुख्य – विजय चूत में, ससुर गांड में, विक्रम मुंह में, राकेश बारी-बारी। जगह बदली 6 बार। डबल चूत, डबल गांड। मुंह में दो लंड एक साथ। मैं निगलती रही। फर्श वीर्य-थूक-पेशाब से गीला। घंटों चला। “ले रंडी, आखिरी पेलाई!” अंत में सबने चूत में झड़ा। मैं बेहोश।

आखिरी रात। सबने जगह बदली 7 बार। मैं चीखती रही, “फाड़ दो हरामियों, बच्चे को वीर्य पिलाओ!” विजय और ससुर ने चूत में डबल, विक्रम और राकेश ने गांड में डबल। मुंह में बारी-बारी। मेरी चूत और गांड दोनों से वीर्य बह रहा था। मैंने खुद कहा, “और लंड चाहिए!” लेकिन चार ही थे। 2 घंटे तक। अंत में सबने चूत में झड़ा, मैं स्क्वर्ट करके फर्श पर गिरी।अगले दिन मुझे बड़े जोरों की प्रसव पीड़ा हुई और मुझे ले जाया गया। बेटे का जन्म अस्पताल में हुआ, 3 किलो का स्वस्थ बच्चा।

डॉक्टर ने कहा, “कुछ दिन आराम करो और सेक्स बिलकुल भी नहीं करना क्योंकि अभी तुम्हारी चूत के टाँके कच्चे हैं,” लेकिन ससुराल लौटते ही विक्रम ने मुझे गोद में उठाया और कमरे में ले गया चोदने के लिए। “रंडी, बच्चा पैदा कर दिया, अब फिर चुदाई की बारी,” उसने गरजा। बच्चा पास के पालने में सो रहा था, मैंने दूध पिलाना शुरू किया। ससुराल वालों ने मुझे फिर से धर की रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में। विक्रम ने पीछे से साड़ी ऊपर की, पैंटी उतारी, और अपना 9 इंच का लंड मेरी चूत में घुसा दिया। मैंने बच्चे को स्तन से लगाया, दूध की धारा उसके मुंह में, और विक्रम की धारा मेरी चूत में। “हाँ बहनचोद, दूध पिलाते हुए पेलो!” मैं सिसकारी। उसने कुल्हे पकड़कर धक्के मारने शुरू किए, धीरे-धीरे, ताकि बच्चा न जागे। मेरी चूत अभी डिलीवरी के बाद ढीली थी, लेकिन गीली। 15 मिनट बाद उसने चूत में वीर्य झड़ा दिया, वीर्य की गर्मी अंदर। बच्चा सोता रहा, मैं कराहती रही।

ससुर हरिप्रसाद ने कहा, “बहू, स्वागत रस्म के दौरान तुम्हे मुझसे मेरे बैडरूम में चारपाई के उप्पर चुदवाना पड़ेगा। मेरे बच्चे का पालना मेरे ससुर के बैडरूम में लगाया गया और मुझे चारपाई पर नंगी करके लेटाया गया” बच्चा पालने में था और मैं नंगी चारपाई पर अपने ससुर जी की रंडी बनने के लिए तैयार थी। ससुर ने अपना 7 इंच का मोटा लंड मेरे स्तनों पर रगड़ा, दूध की बूँदें निकलीं। “दूधिया बूब्स,” उसने कहा और निप्पल चूसा। विजय ने चूत में चार उंगलियाँ घुसाईं, “डिलीवरी के बाद और ढीली हो गई रंडी,” उसने हँसा। राकेश ने गांड में जीभ, विक्रम ने मुंह में लंड।

फोरप्ले शुरू – ससुर दूध चूसता, विजय क्लिट रगड़ता, राकेश गांड चाटता, विक्रम गला चोदता। मैं बच्चे की ओर देखती, “धीरे मादरचोदों, बच्चा जाग जाएगा!” लेकिन वे नहीं रुके। 30 मिनट फोरप्ले के बाद मुख्य – विजय चूत में, ससुर गांड में, विक्रम मुंह में, राकेश स्तन चूसता। धक्के शुरू, चारपाई हिली। मैंने बच्चे को देखा, वह मुस्कुराया जैसे। “हाँ हरामियों, माँ को पेलो!” 45 मिनट तक। सबने जगह बदली, अंत में चूत में झड़े। मैं दूध और वीर्य से लथपथ।

बच्चे के पहले महीने में नई रस्म – दूध पिलाते समय चुदाई। सुबह मैं बच्चे को गोद में लेती, ससुर आगे से दूध चूसता, विजय पीछे से चूत में लंड। “दूध पियो दादाजी, और पेलो बहू को!” मैं कहती। विजय की 10 इंच्च मोटाई से चूत फिर तंग हो रही थी। राकेश मुंह में, विक्रम बेल्ट से कुल्हे लाल करता। बच्चा दूध पीता, मैं कराहती। 20 मिनट तक, विजय चूत में झड़ता। शाम को बच्चे को सुलाकर फर्श पर ग्रुप। मैं घोड़ी, विजय चूत में, ससुर गांड में, विक्रम मुंह में। राकेश इस चुदाई को विडियो कैमरा लाकर रिकॉर्ड करो ताकि यह इसके बच्चे के लिए यादगार रहेगी। मैं घुस्से में चिल्लाई की नहीं भगवन के लिए इस चुदाई को रिकॉर्ड मत करो यदि मेरा बच्चा यह सब देख लेगा तो वो मुझे पुरे खानदान की रंडी समझा करेगा। धक्के जोरदार, फर्श पर थप-थप। 1 घंटा।

दूसरे महीने में मेरा नन्हा सा बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ। ससुर ने मेरी चूत में मुट्ठी मारनी फिर शुरू की। जैसे ही मेरा बच्चा गहरी नींद में सोता, वैसे ही मेरे ससुर जी मुझे बंधक बना लेते थे और फिर मेरे ससुर जी मेरी चूत में मुट्ठी डालकर अंदर बाहर करा करते थे। “फिर फाड़ दोगे ससुरजी!” मैं दर्द के मरे जोर जोर से चीखा करती थी। फिर से मेरा गैंग बैंग होना शुरू हो चूका था, विजय मुझे नंगी करके मेरी गांड में मुट्ठी, राकेश निप्पल क्लैंप, विक्रम बेल्ट से मारकर BDSM चुदाई का मजा लिया करता था। दूध की बूँदें क्लैंप से निकलतीं। स्क्वर्ट की बौछार, बच्चा नहीं जागा। फिर डबल चूत – विजय और विक्रम। “दो लंड ले रंडी!” मैं तड़पती। ससुर गांड में, राकेश मुंह में दो लंड एक साथ। गला फूल गया। 1.5 घंटे। वीर्य की नदियाँ।

तीसरे महीने में मेरा नन्हा बच्चा हमें गैंग बैंग चुदाई करते देख बहुत खिलखिला कर हँसता था। रात को मैं मेरे बच्चे को लोरी गाते हुए चुदाई करवाया करती थी। मैं लोरी गाती, “सो जा बच्चा…” और विजय चूत में लंड डालकर धक्के मारे करता। ससुर मेरे मोटे मोटे बूब्स का दूध चूसता, राकेश गांड में, विक्रम मुंह में। “लोरी के साथ पेलाई,” मैं हँसती। 50 मिनट।

चौथे से छठे महीने तक की दूधिया रातें – बच्चे की उपस्थिति में रस्मों व परंपराओं की आड़ में मेरे साथ डबल-ट्रिपल पेनिट्रेशन

चौथा महीना शुरू हुआ और मेरी चुदाई प्रारंभ रही। मेरा बच्चा पालने में रहता और मैं फर्श पर। विजय और ससुर चूत में डबल, विक्रम और राकेश गांड में डबल। “चार लंड एक साथ!” मैं चीखी। दर्द चरम, लेकिन ऑर्गेज्म की बौछार। बच्चा सोता रहा। 1 घंटा 20 मिनट। पाँचवाँ महीना। दूध की मालिश। ससुर दूध निकालकर मेरे शरीर पर मलता, फिर चाटता। विजय चूत में, राकेश गांड में। विक्रम बेल्ट से मारा करता । बच्चा हमारी गैंग बैंग ग्रुप चुदाई देखता जैसे। “देख बच्चा, माँ की चुदाई,” मैं कहती। हमारी गैंग बैंग चुदाई दिन मैं कई बार होती और कई कई घंटो तक चला करती और मेरा बच्चा एक टक लगाये मेरी चुदाई देखता रहता था।

मेरे बच्चे को पैदा हुए अब छठा महीना लग गया था और अब मेरा नन्हा बच्चा चलने की कोशिश करने लगा था। अभी भी हर रात को मेरे साथ मेरे ससुराल के सभी मर्द ग्रुप सेक्स करा करते थे– मैं घोड़ी बन जायगा करती थी, विजय चूत में, ससुर गांड में, विक्रम मुंह में लंड डालकर मेरे बच्चे के सामने ही मुझे किसी रंडी की तरह चोदा करते थे, और राकेश मेरे मोटे मोटे स्तनों का दूध चूसता रहता था। मैं सामूहिक चुदाई के दौरान सभी मर्दों के धक्के झेलने में लगी रहती थी और मेरा बच्चा मुझे चुदवाते देख बड़ा बच्चा हँसता था।

जब मेरा बच्चे का सातवाँ महीना लगा तो मेरे ससुराल में चुदाई का एक और नया खेल शुरू हो गया। दोस्तों वो चुदाई का नया खेल था अपने नन्हे बच्चे को गोद में लेकर चुदाई करवाने का। गैंग बैंग ग्रुप चुदाई के दौरान मैं मेरे बच्चे को गोद में लेती थी और विजय पीछे मेरी टाइट चूत में अपना गधे के लंड का जैसा तगड़ा लंड पेलता था और जोर जोर से धक्के लगाता था। मैं उन्हें बोला करती थी “धीरे जेठजी!” लेकिन वह मेरी एक नहीं सुना करते थे और लगातार जोरदार धक्के लगते रहते थे। इस दौरान मेरा ठरकी ससुर आगे से मेरे स्तनों को मुंह में लेकर उनका दूध चूसता रहता था। दोस्तों आप मेरा यकीन नहीं करोगे की मेरा बच्चा भी मेरे बूब्स में से इतना दूध नहीं पिया करता था जितना मेरे ससुर जी अकेले पीया करते थे…

आठवें से दसवें महीने तक रस्मों व परंपराओं की आड़ में मेरी गैंग बैंग ग्रुप चुदाई – बच्चे की लोरी में लंड की थाप, दूध-वीर्य का मिश्रण, पूर्ण तबाही

आठवाँ महिना लग चूका था और अब मेरा बच्चा बोलने लगा “माँ… माँ…”। मैं लोरी गाती, विक्रम चूत में लंड दाल कर मेरे बच्चे के सामने ही चोदा करता रंडी बनकर। “मा कहता है, पापा पेलते हैं,” मैं हँसती। ग्रुप पूरा। 2 घंटे। नौवाँ महीना। मुट्ठी फिर – ससुर और विजय दोनों चूत में मुट्ठी एक साथ। “दो मुट्ठियाँ रंडी!” मैं बेहोश। फिर चार लंड। 2 घंटे। दसवाँ महीना। बच्चा चलने लगा। रात को बच्चा कमरे में खेलता, हम चुदाई। मैं घोड़ी, चारों पेलते। बच्चा ताली बजाता। “देख बच्चा, परिवार की रस्म,” ससुर कहता। 2.5 घंटे। ग्यारहवाँ महीना। नया बच्चा प्लान। विक्रम बिना कंडोम फिर। ग्रुप चुदाई जारी। बारहवाँ महीना। मैं फिर गर्भवती। चक्र फिर शुरू।


ससुराल वालों ने रंडी बना दिया रस्मों व परंपराओं की आड़ में अन्तर्वासना हिंदी 18+ XXX गैंग बैंग ग्रुप सेक्स स्टोरी का निष्कर्ष

बेटे के जन्म के बाद ससुराल की ग्रुप चुदाई हमारी दिनचर्या बन गई। मैं रेखा से ससुराल की स्थायी कुल्टा बन चुकी हूँ – चार लंडों की भूखी गुलाम। गर्भावस्था की नौ महीनों की हर रात की विस्तृत पेलाई ने मुझे सिखाया कि बहू का असली कर्तव्य है ससुर, जेठ, देवर और पति की वासना बुझाना। ससुर का मोटा लंड मेरी चूत की गहराई नापता, विजय की क्रूर मोटाई मुझे फाड़ती, राकेश की जवानी मुझे तड़पाती, विक्रम की मालिकाना मुझे गुलाम बनाती। हर मुट्ठी की घुसेड़, हर बेल्ट की मार, हर डबल-ट्रिपल पेनिट्रेशन ने दर्द को अमृत में बदला। बच्चा अब 3 महीने का है, सोता है, और मैं रात को कमरे में चारों के बीच।

अब मेरे ससुराल की एक और नई रस्म सामने आई है जिसमें मैं मैंने मेरे बच्चे को दूध पिलाती रहती हूँ और इस दौरान पीछे से ससुराल का ही कोई मर्द मेरी गांड में अपना लंड घुसेड़ता है और मेरी गांड मारता है। आये दिन रस्मों व परंपराओं की आड़ में ससुर चूत में, विजय गांड में, विक्रम मुंह में लंड पेलकर चुदाई करते रहते हैं। समाज इसे पाप कहे, लेकिन हमारे ससुराल में यह पूजा है। गंदी गालियाँ हमारी भक्ति, वीर्य हमारा प्रसाद, चीखें हमारी मंत्र। यह अनुभव हमें सिखाता है कि सच्चा परिवार शारीरिक सुख से बनता है, गर्भ उसकी नींव, और ग्रुप चुदाई उसकी छत। मैं खुश हूँ, संतुष्ट हूँ, और हमेशा भूखी – चार लंड, एक चूत, अनंत वासना। नया बच्चा प्लान हो रहा है, फिर नौ महीने की जंगली रस्म।

मेरे गैंग बैंग की यह XXX ग्रुप सेक्स कहानी यहीं खत्म नहीं हुई बस मेरे प्रो रंडी बनने का एक नया चक्र शुरू हो गया। बेटे के जन्म के बाद के बारह महीनों की हर रात की विस्तृत ग्रुप चुदाई ने यह साबित कर दिया कि माँ बनना वासना का अंत नहीं, बल्कि फिर से रंडी बनने की एक नुई शुरुआत है। बच्चा अब एक साल का, चलता-बोलता, लेकिन ससुराल की रंडी के रूप में मैंने अपना स्थान मजबूत किया। मेरा बच्चा सोता है या खेलता है, हमारी चुदाई नहीं रुकती – कभी गोद में बच्चा, पीछे लंड; कभी पालने के पास फर्श पर तबाही। अब मैं फिर गर्भवती, दूसरा बच्चा, और रस्में और क्रूर होंगी। समाज इसे गंदा कहे, लेकिन हमारे ससुराल में यह पवित्र पूजा है – गालियाँ मंत्र, वीर्य प्रसाद, ऑर्गेज्म ध्यान।

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