HomeAntarvasna Hindi Sex Storiesमेरी चूत और गांड सौतेले पिता के लंड की गुलाम हो गयी

मेरी चूत और गांड सौतेले पिता के लंड की गुलाम हो गयी

मेरी चूत और गांड सौतेले पिता के लंड की गुलाम हो गयी अन्तर्वासना हिंदी सेक्स स्टोरी का सारांश :- मैं, 21 साल की रुचिका, एक ऐसी युवती हूँ जिसके दिल में जुनून और देह में आग सुलग रही थी। मेरी माँ, सुमन, 39 साल की एक आकर्षक विधवा थीं, जिन्होंने दो साल पहले रमेश, एक ताकतवर और कामुक पुरुष, से दूसरी शादी की। हम लखनऊ के एक रईस मोहल्ले में रहते थे। माँ के ऑफिस में व्यस्त रहने के दौरान, मैंने रमेश की भूखी नज़रों को अपने जवान जिस्म पर महसूस किया। एक दोपहर, जब घर में सिर्फ़ हम दोनों थे, मेरी शरारत और उनकी लालसा ने एक निषिद्ध रिश्ते को जन्म दिया। यह कहानी उस आग की दास्तान है, जो मेरी चूत और उनकी मर्दानगी के बीच सुलगी, जिसमें उत्तेजना, शर्म, और लाचारी का मिश्रण था। हर धक्के, हर स्पर्श, और हर सिसकारी ने मुझे एक ऐसी दुनिया में ले गया, जहाँ सिर्फ़ हमारी देहें बोलती थीं। यह एक ऐसी गुप्त कहानी है, जो मेरे दिल के कोने में हमेशा जिंदा रहेगी।


मैं रुचिका, 21 साल की एक जवान और कुंवारी लड़की, जिसकी गोरी त्वचा और भरा हुआ बदन किसी भी मर्द का दिल चुरा सकता था और लंड खड़ा कर सकता है। मेरी विधवा माँ, सुमन, 39 की उम्र में भी इतनी खूबसूरत थीं कि लोग उनकी तारीफ़ में कसीदे पढ़ते और उनके साथ हमबिस्तर होने के सपने देखते थे। उनके घने बाल, भरे हुए उरोज, और नाज़ुक कमर देखकर कोई उनकी उम्र का अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। मेरे पिता का स्वर्गवास पाँच साल पहले हो गया था, और माँ ने दो साल पहले रमेश से दूसरी शादी कर ली थी। अब वह मेरे सौतेले पिता बन चुके थे। रमेश, 43 साल के एक बलिष्ठ पुरुष, जिनकी गहरी आवाज़ और चौड़ा सीना किसी भी औरत को अपनी ओर खींच सकता था। हम लखनऊ के हज़रतगंज में एक आलीशान बंगले में रहते थे। माँ एक बैंक में मैनेजर थीं और सुबह से शाम तक बाहर रहती थीं। रमेश एक ठेकेदार थे, और उनका ज़्यादातर समय घर पर ही बीतता था। मैं कॉलेज में पढ़ती थी, और जब से रमेश हमारे घर आए, उनकी नज़रें मेरे जिस्म को ताड़ने लगी थीं।

पहले तो मेरे सौतेले पिता की वो भूखी निगाहें मुझे असहज करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे वो मेरे लिए एक नशा बन गईं। मैं जानबूझकर उनके सामने टाइट कुर्तियाँ और पतली लैगिंग्स पहनने लगी। मेरी जाँघें और उभरे हुए उरोज उनकी आँखों को ललचाते, और मैं उनकी साँसों की गर्मी को महसूस करती। एक दोपहर, जब माँ ऑफिस गई थीं, मैंने एक पतली सी सलवार और चुस्त कुर्ती पहनी थी, जो मेरे कर्व्स को और उभार रही थी। रमेश ड्रॉइंग रूम में अख़बार पढ़ रहे थे। मैंने बहाने से उनके सामने से गुजरना शुरू किया, कभी चाय का कप लेने तो कभी कुछ और। उनकी नज़रें मेरी कमर पर ठहरीं, और मैंने देखा कि उनका चेहरा तनाव से भरा था।

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“क्या बात है, रुचिका? आज कुछ ज़्यादा ही बेचैन लग रही हो,” रमेश ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, आँखों में एक शरारत लिए। मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “गर्मी है ना, रमेश जी, मन कहीं टिकता ही नहीं।” मैंने जानबूझकर उनके सामने झुककर टेबल पर रखी किताब उठाई, ताकि मेरे उरोज उनकी नज़रों के सामने आएँ। उनकी साँसें तेज़ हुईं, और उन्होंने बेशर्मी से कहा, “तेरी ये गर्मी तो मेरे जिस्म में भी आग लगा रही है।” मेरी धड़कनें रुक सी गईं, और मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। मैंने उनकी आँखों में देखा और फुसफुसाया, “तो इस आग को बुझाइए ना, रमेश जी।”

मेरे सौतेले पिता ने अख़बार फेंका और मेरे करीब आए। उनकी गर्म साँसें मेरे गालों को छू रही थीं। “सच कह रही है?” उन्होंने मेरी कमर को थामते हुए पूछा। मैंने जवाब की बजाय अपने होंठ उनके होंठों से मिला दिए। हमारा चुम्बन एक तूफ़ान था, जैसे दो प्यासे रेगिस्तान में मिले हों। मेरी जीभ उनकी जीभ से उलझी, और मेरे हाथ उनकी कमीज़ के नीचे उनकी मज़बूत छाती तक गए। मेरे सौतेले पिता की त्वचा की गर्मी मुझे पागल कर रही थी। “रमेश जी, मुझे आपका वो मर्दाना अहसास चाहिए… जैसे आप मेरी माँ की चुदाई करते हो वैसे मेरी भी चुदाई कर लो और मेरी प्यास बुझा दो,” मैंने बेकाबू होकर मेरे सौतेले पिता से कहा।

सौतेले पिता ने मेरी सलवार कुर्ती उतारकर चोदने के लिए मुझे नंगी कर दिया

मेरे सौतेले पिता ने मेरी मेरी कुर्ती को एक झटके में उतार दिया। मेरी लाल ब्रा में कैद उरोज उनके सामने थे। उन्होंने ब्रा को खींचकर फेंक दिया, और मेरे सख्त निप्पल उनके मुँह में थे। वो उन्हें चूस रहे थे, जैसे कोई भूखा शिकारी अपनी मिठास पा गया हो। मैं सिसकार रही थी, “आह… रमेश जी, मेरी चूत को सहलाओ… इसे तर कर दो।” उनकी उंगलियाँ मेरी सलवार के नाड़े तक गईं, और एक पल में मेरी सलवार और पैंटी फर्श पर थी। मेरी चिकनी, गीली चूत उनके सामने थी। उनकी उंगलियाँ मेरे दाने पर फिसलीं, और मेरा रस उनके हाथों पर चिपक गया। “तेरी कुंवारी चूत तो पहले से ही बरस रही है बेटी,” मेरे सौतेले पिता ने कहा और अपनी जीभ मेरी चूत पर रख दी मुखमैथुन करने के लिए।

जैसे ही सौतेले पिता ने मुखमैथुन करने के लिए मेरी कुंवारी चूत पर अपनी जीभ लगायी मैं बैचेन होकर जोर से चीख पड़ी, “आह… चाटो इसे… और गहराई तक!” उनकी जीभ मेरी चूत की गहराइयों में थी, और मेरा बदन हर चाट पर थरथरा रहा था। मैंने चूत चटवाते हुए मेरे सौतेले पिता के बाल पकड़े और उनकी खोपड़ी को मेरी चूत में और अधिक गहराई में दबाया। उन्होंने अपनी एक उंगली मेरी टाइट गांड में डाली, और मैं सिसकारी, “रमेश जी… मेरी गांड भी लो!” उन्होंने अपनी पैंट उतारी, और उनका मोटा, तना हुआ लंड मेरी नजरों के बिलकुल सामने लटका हुआ था। मैंने उसे हाथ में लिया और उसके टोपे को अपनी जीभ से ऐसे चाटा जैसे ठंडी ठंडी आइसक्रीम चाटते हैं। उनकी सिसकारियाँ हवा में गूँज रही थीं, “तेरा मुँह तो अमृत है, रुचिका।”

मैंने मेरे सौतेले पिता को सोफे पर धकेला और उनकी गोद में बैठ गई। मैंने उनके लंड को अपनी चूत पर रगड़ा और धीरे-धीरे उसे अंदर लिया। “आह… रमेश जी, आपका लंड मेरी चूत को चीर रहा है,” मैं कराहते हुए बोली। उन्होंने मेरे चूतड़ पकड़े और मुझे ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे करने लगे। हर धक्के के साथ मेरी चूत उनके लंड को निगल रही थी, और मेरे उरोज हवा में उछल रहे थे। उन्होंने मेरे निप्पल को दाँतों से हल्के से काटा, और मैं चीखी, “और ज़ोर से… मेरी चूत को रगड़ दो!”

मेरे सौतेले पिता ने मुझे पलटकर डॉगी स्टाइल में लिटाया। मेरे घोड़ी बनते ही अब मेरी कुंवारी गांड मेरे सौतेले पिता के सामने थी, और उन्होंने उस पर एक थप्पड़ मारा। “तेरी ये रसीली गांड… इसे भी तो चखना है मेरी प्यारी बेटी रानी,” उन्होंने कहा। मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “तो चख लो ना डार्लिंग… मेरी कुंवारी गांड कब से वैचेन है।” फिर मेरे सौतेले पिता ने अपनी उंगलियाँ मेरी चूत के रस से गीली कीं और मेरी गांड में डालीं। मैं सिसकारी, लेकिन अपनी गांड को और पीछे धकेला। उन्होंने अपने लंड को मेरी गांड के छेद पर रखा और धीरे-धीरे अंदर धकेला। “आह… आपका लंड मेरी गांड को फाड़ रहा है!” मैं चीखी, लेकिन उस दर्द में एक मज़ा था।

सौतेले पिता ने घोड़ी बनकर मेरी गांड चुदाई भी करी

मेरे सौतेले पिता की चुदाई करने कीई रफ्तार बढ़ी, और उनका 7 इंच लंबा और 4 इंच मोटा लंड मेरी कुंवारी गांड में जल्दी जल्दी अंदर-बाहर होने लगा। घोड़ी बनकर गांड चुदाई करवाने के दौरान मेरी कुंवारी चूत से काम रस टपक रहा था, और मेरे चूतड़ उनकी जाँघों से टकराते हुए थप…थप… थप…थप… की कामुक आवाजें उत्पन कर रहे थे। उन्होंने मुझे फिर से पलटाया और मेरी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उनका लंड मेरी चूत में फिर से घुसा, और वो मुझे ज़ोर-ज़ोर से ठोकने लगे। “तेरी चूत इतनी टाइट है… मैं झड़ने वाला हूँ,” उन्होंने कराहते हुए कहा। मैंने अपनी चूत को और सिकोड़ा और अपने सौतेले पिता से बोली, “मेरे अंदर झड़ो… मुझे आपका गर्म रस चाहिए मेरी इस प्यासी चूत के अंदर!”

चुदाई के दौरान मेरे सौतेले पिता के धक्के और तेज़ हुए। मेरी कुंवारी चूत और गांड दोनों उनके मुसल जैसे तगड़े लंड से रगड़ खा चुकी थीं। आख़िरकार, उन्होंने एक ज़ोरदार धक्का मारा, और उनका गर्म रस मेरी प्यासी चूत में भर गया। मैं भी उसी पल झड़ गई, और मेरा रस मेरे सौतेले पिता के लंड पर बहने लगा। हम दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे की बाहों में गिर पड़े। हमारी देहें पसीने और रस से लथपथ थीं। मैंने उनकी छाती पर सिर रखा और हल्के से हँसी, “रमेश जी, आपने मेरी आग तो बुझाई, लेकिन मेरी प्यास और बढ़ गई।”

उस दिन के बाद, मेरा और मेरे सौतेले पिता रमेश का रिश्ता एक नया रंग ले चुका था। जब भी मेरी माँ घर से बाहर होतीं, मेरे सौतेले पिता रमेश की हवस से भरी नज़रें मुझे चोदने के लिए तलाशतीं। उनकी मज़बूत बाहें और उनका मोटा लंड मेरे लिए एक नशा बन गया था, मेरी चूत और गांड सौतेले पिता के लंड की गुलाम हो गयी थी। एक बार माँ के ऑफिस से लौटने से पहले, रमेश ने मुझे रसोई में पकड़ लिया। “तेरी चूत की गर्मी तो सुमन से भी ज़्यादा है,” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया और मुझे काउंटर पर झुकाकर फिर से ठोकना शुरू कर दिया। मेरी सिसकारियाँ रसोई में गूँज रही थीं।

हमारी ये चोरी-छिपे की चुदाई अब एक आदत बन गई थी। कभी बाथरूम में चुदाई, कभी उनके बेडरूम में चुदाई, और कभी रसोई घर में चुदाई, रमेश मेरी चूत और गांड को चुदाई के दौरान काफी जख्मी कर देते थे जिस वजह से मुझे काफी ज्यादअ दर्द होता था मगर आनंद भी काफी आता था। एक रात, जब माँ गहरी नींद में थीं, रमेश मेरे कमरे में आए। “सुमन को चोदने में वो मज़ा कहाँ, जो तुझमें है,” उन्होंने मेरी चूत में लंड डालते हुए कहा। मैंने उनकी कमर पकड़ी और उन्हें और गहराई में खींचा।

इस गुप्त रिश्ते ने मेरे और मेरे सौतेले पिता रमेश के बीच एक ऐसी आग जला दी थी, जो बुझने का नाम नहीं ले रही थी। माँ को कभी हम बाप-बेटी के अवैध सेक्स संबंधों को लेकर शक नहीं हुआ, क्योंकि रमेश उनके सामने एकदम सभ्य बने रहते थे और मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करते थे। लेकिन मेरे लिए, उनकी हर नज़र, हर स्पर्श एक तूफ़ान था। मेरी चूत और गांड अब उनके लंड की गुलाम हो चुकी थीं। हर रात, जब मैं बिस्तर पर लेटती, उनकी चुदाई की यादें मुझे फिर से गीला कर देती थीं।

उस रात की चुदाई हमारे बीच का एक अनकहा राज़ बन गई। रमेश का मोटा लंड और मेरी टाइट चूत एक-दूसरे के लिए बने थे। हर बार जब माँ घर से बाहर जातीं, हमारी साँसें फिर से गर्म हो उठती थीं। मेरे लिए, रमेश अब सिर्फ़ सौतेले पिता नहीं थे, बल्कि वो मर्द थे, जिन्होंने मेरी देह को स्वर्ग का सुख दिया।


मेरी कुंवारी चूत और गांड सौतेले पिता के लंड की गुलाम हो गयी अन्तर्वासना हिंदी सेक्स स्टोरी का समापन

उस गर्मी भरी दोपहर ने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। रमेश और मेरे बीच का रिश्ता एक निषिद्ध आग था, जो हर मुलाकात में और भड़कती थी। मैं उत्तेजना, शर्म, और लाचारी के बीच झूलती रही। उनकी मर्दानगी ने मेरी देह को तो छुआ ही, मेरे दिल में भी एक अनजानी जगह बना ली। माँ को कभी इस राज़ की भनक नहीं पड़ी, और शायद यही हमारी कहानी का सबसे बड़ा सच था।

मेरे सौतेले पिता रमेश की भूखी नज़रें और मेरी बेकाबू प्यास ने हमें एक ऐसी दुनिया में बाँध दिया, जहाँ सिर्फ़ हमारी देहें और साँसें थीं। अब भी, जब मैं अकेले में उनकी यादों में खोती हूँ, मेरी कुंवारी चूत और गांड में वही सनसनी जाग उठती है। ये कहानी मेरे दिल का एक कोना है, जो हमेशा उनके नाम रहेगा। क्या आपने कभी ऐसी प्यास महसूस की है? आपकी राय और सुझाव मेरे लिए अनमोल होंगे। कृपया अपनी प्रतिक्रिया साझा करें।

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