HomeAntarvasna Hindi Sex Storiesमेरी पहली गैंगबैंग चुदाई जंगल में आदिवासियों के साथ

मेरी पहली गैंगबैंग चुदाई जंगल में आदिवासियों के साथ

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मेरा नाम कविता मिश्रा है। उम्र 32 साल है और पिछले 8 सालों से मैं वन्यजीव फोटोग्राफी कर रही हूं। मुंबई की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी से दूर, कैमरे के पीछे घंटों बिताना मुझे सुकून देता है। लेकिन पिछले महीने कर्नाटक के घने दांडेली जंगलों में जो हादसा हुआ, उसने मेरे तन और मन को ऐसे उधेड़ कर रख दिया कि मैं आज भी उस जंगली मर्द के तना हुआ लंड को याद करके सिहर जाती हूं।

ये बात मार्च के दूसरे हफ्ते की है। मैं और मेरे 3 साथी दुर्लभ ब्लैक पैंथर की तस्वीरें लेने इस घने जंगल में गए थे। हमारा कैंप एक छोटी सी नदी के किनारे था। सुबह के 6 बजे मैं सूरज की पहली किरणों के साथ एक खास एंगल पकड़ने जंगल के अंदर अकेली चली गई। हाथ में कैमरा, पीठ पर बैग और कूल्हों पर टाइट कार्गो जीन्स। ऊपर खाकी रंग की स्लीवलेस टॉप जो पसीने से मेरे 36D के बोबों से चिपक रही थी। मैंने स्पोर्ट्स ब्रा पहनी थी जो मेरे रसीले बूब्स के उभार को दबा रही थी।

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मैं एक मोटी सूंड वाले पेड़ के पीछे घुटनों के बल बैठी, पत्तों की सरसराहट को अपने कैमरे के लेंस में कैद कर रही थी। उस वक्त मुझे नहीं पता था कि ये सरसराहट जंगली बिल्ली की नहीं, बल्कि एक असली जंगली मर्द की थी जो मेरी गांड और चूत को अपना शिकार बनाने वाला था।

अचानक मुझे एहसास हुआ कि आसपास बिल्कुल सन्नाटा है। मैंने पीछे मुड़कर देखा — मेरे साथी कहीं नहीं थे। मैं काफी दूर निकल आई थी। पेड़ इतने घने थे कि सूरज की रोशनी तक नहीं चमक रही थी। मेरे हाथों में हल्की कंपकंपी होने लगी। तभी सूखे पत्तों की चरमराहट हुई। सामने से 6 फुट से ऊंचा, सांवला बदन, चौड़ी छाती, और कमर पर पत्तों का एक झुंड बांधे एक आदिवासी मर्द निकला। उसके हाथ में एक नुकीला भाला था। मेरी सांसें थम गईं।

उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। वो मेरे कपड़ों को ऐसे घूर रहा था जैसे ये आदिवासी अपने जीवन में पहली बार किसी औरत को ढके हुए देख रहा हो। उसने भाले से इशारा किया — कपड़े उतारो। मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। मैंने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाई, लेकिन उसने दहाड़ कर अपना भाला मेरी गर्दन के करीब कर लिया। मैं डर के मारे कांपने लगी। धीरे-धीरे मैंने अपना टॉप सिर के ऊपर से खींच कर उतार दिया।

मेरी स्पोर्ट्स ब्रा के ऊपर से मेरे चुचों की गोलाई साफ झलक रही थी। फिर मैंने जीन्स की बेल्ट खोली और वो टाइट पैंट मेरे चूतड़ों से रगड़ खाती हुई नीचे गिर गई। मैं सिर्फ ब्रा और लाल रंग की लेस पैंटी में खड़ी थी। उसने भाले से ज़मीन की तरफ इशारा किया — लेट जा।

मैं सूखी पत्तियों पर पीठ के बल लेट गई। उसकी खूंखार नज़रें मेरी छातियों को चाट रही थीं। उसने मेरी ब्रा के ऊपर से अपनी चौड़ी हथेली रख दी। मैंने चुपचाप आंखें बंद कर लीं। वो किसी जानवर की तरह सूंघ रहा था मेरे पसीने की महक। उसकी उंगलियां धीरे-धीरे मेरे निप्पलों के ऊपर गोल घुमने लगीं। मेरी सांस तेज़ हो गई। मैं मन ही मन सोच रही थी, “ये जंगली मुझे क्यों छू रहा है? लेकिन ये सिहरन… डर है या कुछ और?” मेरा पूरा बदन कांप रहा था लेकिन मेरी चूत में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई थी।

अचानक उसने गुर्राते हुए मेरी ब्रा को बीच से पकड़ा और एक झटके में फाड़ डाला। मेरे 36D के बोबे पत्तों की गीली रोशनी में उछल पड़े। मेरे निप्पल गुलाबी और डर से कड़े हो चुके थे। वो झट से मेरी छातियों पर लपका। उसका मुंह सीधे मेरे दाएं स्तन पर गिरा और उसने मेरी चूची के पूरे हिस्से को अपने मुंह में भर लिया। एक गहरी, गर्म सक्शन से मेरी पूरी देह सिहर उठी। मैंने ज़ोर से हांफते हुए हवा खींची।

वो पूरी जंगली भूख से मेरे निप्पल चूसने लगा — उसकी जीभ खुरदरी थी, उसके दांत हल्के से काटते, फिर वो गहराई तक चूसता। मेरी आंखें बंद थीं और मेरे मुंह से अनायास हल्की सी कराह निकल गई। “आआह… ये क्या हो रहा है?” मेरा मन शर्म से भरा था, मगर मेरी रसदार चूत का पानी अब मेरी पैंटी को भिगोने लगा था।

उसने मेरी दोनों बोबों को बारी-बारी से ऐसे मसला जैसे उन्हें निचोड़ कर सारा रस पी जाएगा। मेरे निप्पल उसके होंठों के बीच तने हुए थे और मैं बस उसकी इस हैवानियत को महसूस करती रही। कुछ 5 मिनट बाद उसने अपना ध्यान नीचे किया। उसने मेरी पैंटी को साइड से पकड़ा और एक जोरदार खिंचाव में वो छोटी सी लाल कपड़े की पट्टी चीर कर अलग कर दी। मेरी झांट के बालों वाली चूत उसके सामने खुली पड़ी थी।

उसने मेरी जांघों को ज़ोर से फैला दिया। मेरी चूत के होंठ सूजे हुए, गीले और खुले हुए थे। उसने अपना चेहरा वहीं दबा दिया। मैंने चीखना चाहा, लेकिन जैसे ही उसकी चौड़ी, गरम जीभ मेरी बुर के कटोरे पर पूरी तरह फैल गई, मेरी चीख कराह में बदल गई। “हाय अल्लाह… ओह… ये तुम क्या कर रहे…” मेरे मुंह से बेहिसाब शब्द निकल रहे थे। वो चूत चाटने लगा, जैसे आम चूसता है कोई — ज़ोर-ज़ोर से, चट-चट की आवाज़ों के साथ।

उसकी जीभ मेरी फुद्दी के छेद पर सीधे मार रही थी और बीच-बीच में भगनासे पर तेज़ सक्शन दे रही थी। मेरी कमर उछल रही थी। मेरे अंदर की हर नस जाग गई थी। मैं अब उसे रोक नहीं रही थी, बल्कि उसके बालों को पकड़ कर चूत उसके मुंह पर रगड़ रही थी। “हां… ऐसे ही… लिक कर मेरी भोसड़ी को… अह्ह…”

करीब 10 मिनट तक उसने मेरी चूत को जी भर के चाटा। मैं एक बार चरम पर पहुंचते-पहुंचते रुक गई। उसने गुर्राते हुए सिर उठाया और अचानक अपनी कमर से पत्ते हटा दिए। जो मैंने देखा, वो देखकर मेरी सांस थम गई। उसका लंड इतना बड़ा, मोटा और खड़ा था कि मानो किसी जानवर का हो। कम से कम 9 इंच लंबा, उभरी हुई नसों से भरा, ऊपर सुर्ख गूदा और नीचे दो बड़े-बड़े लंड के गोटे जैसे आम लटक रहे हों। ये कोई इंसानी लौड़ा नहीं, गधे का लंड लग रहा था। मैं घबराकर पीछे हटने लगी। “नहीं… इतना बड़ा… मेरी चूत फट जाएगी…”

पर वो जंगली कहां मानने वाला था। उसने एक झटके में मेरी जांघें पकड़ीं और मुझे घसीट कर अपनी तरफ खींच लिया। मैं ज़मीन पर पीठ के बल गिर गई। उसने मेरे घुटनों को मेरी छातियों तक दबा दिया और अपने मोटे लंड का सुपारा मेरी टाइट चूत के छेद पर टिका दिया। मैंने ज़ोर से दांत भींच लिए। मेरा शरीर पसीने से तर था। और फिर एक दर्द भरी चीख के साथ, उसने अपना पूरा बड़ा लंड एक ही झटके में मेरी भीगी चूत के अंदर घुसा दिया।

“हाय मर गई… आआह… भोसड़ी फट गई…” मैं ज़ोर से चिल्लाई। मेरी चूत की दीवारें उसके भारी भरकम लंड से तनकर फटने को हो गईं। उसने जरा भी रहम नहीं किया। वो किसी जंगली जानवर की तरह मेरे ऊपर झुका और बिना किसी लय के, झटके पर झटका देने लगा। जंगल में मैं एक आदिवासी के साथ आउटडोर सेक्स (Outdoor Sex) कर रही थी और मिशनरी पोजीशन में मेरी चुदाई हो रही थी।

उसकी जांघें मेरे कुल्हों से टकरा रही थीं। मैं हर झटके पर दर्द और सुख के मिले-जुले आलम में कराहती। “अह्ह… ऐसे मत चोद… कोमल है… हां… और तेज़… हां…” मेरी अपनी ही आवाज़ मुझपर बेकाबू होती जा रही थी। मेरी चूत का रस अब उसके लंड को चिपचिपा बना चुका था। चुदाई की चपचप की आवाज़ें पूरे सुनसान जंगल में गूंज रही थीं।

लगभग 15 मिनट तक उसने मुझे ज़मीन पर पटक-पटक कर चोदा। फिर अचानक वो मेरे अंदर से अपना गीला, फिसलता लंड निकाल कर पीछे हटा और मुझे पलट कर घोड़ी बनने का इशारा किया मैं समझ गयी की अब ये साला मुझे घोड़ी बनाकर मेरी गांड मारेगा। मेरी फूटी हुई चूत से चिपचिपा माल रिस रहा था। मैं घुटनों और हथेलियों के बल ज़मीन पर आ गई। मेरी गोल मटोल गांड उसके सामने थी। मैं समझ गई कि अब वो मेरे गांड के छेद पर भी हमला करने वाला है।

अभी तक उसने मेरी चूत की जो हालत की थी, मेरी गांड के साथ भी वैसा ही होने वाला था। मैंने डरते हुए अपने चूतड़ों को हल्का सा खोला। उसने मेरी गांड के छेद पर अपने लार को थूका और अपने लौड़े के टोपे पर चूत का रस लगाया। फिर धीरे से अपना अंगूठा मेरे गांड के छेद में डाला। मैं सिहर गई। “धीरे… बहुत टाइट है…” उसने मेरी बात नहीं सुनी और एक तेज़ धक्के में अपना अंगूठा निकाल कर लंड का फन मेरे गुदा द्वार पर रख दिया।

एक पल में ही उसने अपना पूरा मोटा लंड मेरी गांड में उतार दिया। “हाऽऽय… मर गई मैं तो… भोसड़ी में आग लग गई…” मेरी चीखें गूंज उठीं। उसकी पकड़ मेरे नंगे कूल्हों (Naked Hips) पर थी और मैं चीखती रही, लेकिन 2-3 मिनट के बाद दर्द की जगह एक अजीब किस्म की भरापन और उत्तेजना होने लगी। गुदा सेक्स की वो पहली अनुभूति मेरे पूरे शरीर में बिजली कौंधा रही थी। मेरे बोबे झूल रहे थे और मैं “हां… ओर… ज़ोर से… मार मेरी गांड में…” चिल्ला रही थी। पूरे 20 मिनट उसने मेरी गांड की जमकर सफाई की। मेरी गांड का छेद लाल और ढीला हो गया था। मैं बुरी तरह पिट चुकी थी।

थक कर वो मुझसे अलग हुआ। मेरी समझ में आया कि अब मैं आज़ाद हूं, लेकिन तभी उसने पास ही बेलों से कुछ रस्सियां बनाईं और मेरे हाथ बांध दिए। मैं नंगी, थकी, और चूत-गांड से माल टपकती, उसके पीछे-पीछे जंगल के अंदर चल पड़ी। करीब 1 घंटे के बाद हम एक छोटी सी आदिवासी बस्ती में पहुंचे। वहां 8-10 और जंगली मर्द मौजूद थे। उन्होंने मुझे देखा तो उनकी आंखों में वही भूख दिखी। मुझे एक लकड़ी के खंबे से बांध दिया गया।

वो सारे मर्द, अलग-अलग उम्र के, वो सभी मेरी तरफ किसी भूखे भेड़िये की जैसे बढ़े। कोई मेरी चुची दबा रहा था, कोई मेरी गांड की सुराख में उंगली कर रहा था, कोई मेरी चूत चाटने लगा। मैं पूरी तरह रंडी की तरह इस्तेमाल हुई। पहले एक मोटी मूंछों वाले ने मेरी चूत ली, फिर एक दुबले ने मेरे मुंह में अपना पतला लंड ठूंस दिया। उन आदिवासियों ने मुझे करीब करीब हर सेक्स पोजीशन में चोदा होगा…

मैं हर लौड़े को मुखमैथुन करने लगी, आंखों से आंसू और मुंह से लार बह रही थी। “चूस मेरा लंड, रांड… गहरा ले…” एक ने मेरे बाल पकड़ कर अपना पूरा लंड गले के नीचे उतार दिया। मेरा गला बंद हो गया। फिर किसी ने मुझे उल्टा लिटा कर मेरी गांड में लंड डाला, तो कोई मेरी चूत में। एक साथ दो लंड मेरे अंदर थे — एक चूत में, एक गांड में। मैं लगभग बेहोश होने वाली थी। मेरी फटी हुई चूत और गांड से खून और शुक्राणु टपक रहे थे। पूरे 2 घंटे तक उस जमात ने मेरी बारी-बारी से चुदाई की।

उन आदिवासियों के साथ गैंगबैंग ग्रुप चुदाई करने के बाद आखिरकार मैं अधमरी होकर गिर पड़ी। सुबह हुई तो सन्नाटा था। वो मुझे उसी तरह, नंगी और माल से लथपथ, जंगल के किनारे छोड़ गए जहां से मुझे मेरे साथियों ने ढूंढ लिया। मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। लेकिन आज जब अकेली होती हूं, मेरी चूत उसी जंगली के लंड के लिए तड़पती है। वो दर्द और वो मज़ा, दोनों अब मेरी रगों में बस गए हैं। दोस्तों जंगल में आदिवासियों के साथ यह मेरे जीवन की पहली गैंगबैंग चुदाई चुदाई थी मुझे बहुत दर्द हुआ मगर आनंद भी बहुत आया…

अब आप बताइए, मेरी इस आपबीती आउटडोर गैंगबैंग चुदाई कहानी (Antarvasna Hindi outdoor group sex story) पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? क्या आपको मेरी ये आउटडोर गैंगबैंग चुदाई कहानी पसंद आई? कृपया अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें। मुझे बताएं कि आपको सबसे ज़्यादा गर्मी किस पार्ट में लगी। आपके विचार मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं।

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