पिता की रखैल बनी वर्जिन विवाहिता चरमसुख पाने के लिए अन्तर्वासना हिंदी कौटुम्बिक व्यभिचार कहानी का सारांश :- एक सुहागरात जो कभी हुई ही नहीं, एक पति जो किसी और का दीवाना है, और एक विवाहिता का तन जो अधूरेपन की आग में जल रहा है। मजबूर नारी जब घर की रसोई में छुपे केले, खीरे और बेलन जैसी वस्तुओं में अपनी तड़प भरी जवानी की आग बुझाने का जरिया ढूंढती है, तब उसकी यह अन्तर्वासना उसके अपने पिता देख लेते हैं। बेटी की इस हालत को देखकर पिता का खून पानी हो जाता है।
वह पूछ ही बैठते हैं कि बेटी, ऐसी क्या मजबूरी है कि तू इन बेजान चीजों से अपनी कामतृप्ति कर रही है? क्या तेरा पति तुझे चोद नहीं सकता? तब बेटी फूट-फूट कर रोते हुए अपने पिता को बताती है कि वह आज भी वर्जिन है और उसके पति का किसी दूसरी औरत के साथ अवैध संबंध है। यह सुनकर पिता का दिल टूट जाता है और वह स्वयं अपनी बेटी की सुहागरात बनाने का फैसला कर लेते हैं, जो एक अवैध, वर्जित लेकिन वासना से भरे रिश्ते की शुरुआत बन जाती है।
Hindi Father Daughter Incest Sex Kahani :- मेरा नाम रागिनी है और मैं एक साधारण से मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी एक भोली-भाली लड़की हूँ। मेरी शादी सुरेश से हुए मुझे दो साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी मैं उतनी ही कुंवारी हूँ जितनी अपने मायके के आंगन में थी। मेरे पति सुरेश मुझे अपनी पत्नी मानते ही नहीं बल्कि मैं तो उनके लिए घर की एक ऐसी मजबूरी हूँ जिसे वह सहन कर रहे हैं। उनके मन में कोई और बसती है और उनके परिवार ने जबरदस्ती उनकी शादी मुझसे करवा दी थी। इस दो साल की शादीशुदा जिंदगी में उन्होंने कभी मेरा हाथ तक नहीं छुआ, मुझे अपने सीने से नहीं लगाया और ना ही कभी मेरे बिस्तर पर आए।
फ्री पढ़ें पिता की रखैल बनी वर्जिन विवाहिता चरमसुख पाने के लिए Hindi Father Daughter Incest Sex Kahani

मेरा तन जवान है, मेरे खून में गर्मी है और हर रात जब मैं अकेले पड़े बिस्तर पर करवटें बदलती हूँ तो मेरी चूत के अंदर एक अजीब सी जलन और खुजली सी होने लगती है। मेरे स्तन भारी हो गए हैं और उनके अंदर दूध भरने जैसा दर्द होता है जिसे कोई हाथ नहीं लगाता। मैं अब और अधिक समय तक इस अकेलेपन को सहन नहीं कर सकती थी इसीलिए मैंने अपनी इस कामुकता की आग को बुझाने के लिए घर की उन चीजों की ओर देखना शुरू कर दिया जिनका आकार किसी मर्द के लंड जैसा हो।
रसोई का सामान बना मेरी वासना का साथी सेक्स टॉय की तरह काम में लिया
मुझे याद है पहली बार जब मैंने रसोई में रखे एक पूरे पके हुए केले को उठाकर देखा था। उसका आकार, उसकी लंबाई और उसका मुलायम लेकिन सख्त होना मुझे एकदम सीधा खड़े हुए लंड की याद दिला रहा था। उस रात जब घर में सब सो गए तो मैंने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर लेटकर अपनी साड़ी उतार दी।
मैंने वह केला अपने हाथ में लिया और धीरे-धीरे उसे अपनी जांघों के बीच की उस दरार पर फिराने लगी। केले की ठंडक ने मेरी चूत को छुआ तो मैं सिहर उठी। मैंने आहिस्ता से उस केले के सिरे को अपनी चूत के छेद में दबाना शुरू किया जो पहले से ही तड़प कर पानी की तरह गीली हो चुकी थी।
धीरे-धीरे मैंने उसे अंदर धकेलना शुरू किया और मेरे मुंह से एक गहरी आह निकल गई। हे भगवान! इतने दिनों के बाद मेरी चूत के अंदर कोई चीज घुस रही थी। मैंने आंखें बंद करके कल्पना की कि कोई असली लंड मेरी चूत में धस रहा है। मैंने उस केले को अंदर-बाहर करना शुरू किया और मेरी चूत उसे जोर-जोर से चूसने लगी।
कुछ देर बाद मेरी वासना इतनी बढ़ गई कि मैंने केले को पूरा अंदर तक घुसा दिया और फिर अपनी चूत की मांसपेशियों को भींच-भींच कर उसे दबाने लगी। जब मुझे चरमसुख मिला तो मैं जोर से काँप उठी और मेरी चूत से रस की धार बह निकली। लेकिन यह सुख क्षणिक था। अगले ही पल मुझे एहसास हुआ कि मैं क्या कर रही हूँ और मैं रोने लगी। फिर भी मजबूरी थी तो अगले दिन मैंने खीरे का सहारा लिया।
खीरे और बेलन से बुझती थी मेरी अन्तर्वासना
एक दिन मैंने फ्रिज से एक लंबा मोटा खीरा निकाला और उसे अच्छी तरह धोकर अपने कमरे में ले आई। इस बार मैंने पहले अपनी चूत को जी भर कर सहलाया और फिर उस खीरे को अपनी चूत के अंदर तक ले जाकर जोर-जोर से चोदने लगी। खीरा केले से ज्यादा सख्त था और उसकी सख्ती मेरी चूत के अंदर एक अलग ही सुख दे रही थी। मैंने अपने दूसरे हाथ से अपने स्तनों को दबाना और चिकोटी काटना शुरू कर दिया।
मैं जोर-जोर से कराह रही थी और मेरे मुंह से बदसूरत शब्द निकल रहे थे। “हां, हां… और जोर से चोदो मेरी चूत को… बहुत तड़प रही है मुझ वर्जिन विवाहिता की फुद्दी।” फिर एक दिन मुझ वर्जिन विवाहिता ने बेलन का सहारा लिया चरमसुख पाने के लिए। बेलन बहुत मोटा और भारी था। पहली बार जब मैंने उसे अपनी चूत में डाला तो मुझे बहुत दर्द हुआ लेकिन धीरे-धीरे मेरी चूत उसकी मोटाई की आदी हो गई। उस रात मैंने अपनी गांड को भी चोदने की कोशिश की।
मैंने बेलन पर तेल लगाया और आहिस्ता से अपनी गांड के छेद में दबाना शुरू किया। पहले तो बहुत तकलीफ हुई लेकिन जैसे ही बेलन का सिरा अंदर घुसा मैं चीख पड़ी। यह एक अलग ही तरह की वेदना थी जो धीरे-धीरे सुख में बदलने लगी। मैंने बेलन को गांड के अंदर धकेला और फिर धीरे-धीरे चोदने लगी। इस तरह मैंने केला, खीरा, बेलन, गाजर, हर उस चीज का सहारा लिया जो मुझे एक मर्द की याद दिला सके।
पापा का अचानक आगमन और वह भयानक रात
उन दिनों मेरे पिता जी का मेरे ससुराल आने का कार्यक्रम बना। पापा बहुत दूर रहते थे और काफी समय से मुझसे मिलने नहीं आए थे। उनके आने की खबर सुनकर मैं बहुत खुश हुई लेकिन साथ ही डरी हुई भी थी कि कहीं वह मेरी इस टूटी हुई शादी के बारे में न जान जाएं। पापा आए और दो दिन रुकने वाले थे।
पहले दिन तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन दूसरी रात वही हुआ जिसकी मुझे कभी उम्मीद नहीं थी। उस रात मेरे पति सुरेश घर पर नहीं थे। वह हमेशा की तरह अपनी रखैल के पास गया हुआ था। सास-ससुर भी किसी काम से बाहर गए हुए थे। पापा पास वाले कमरे में सो रहे थे और मैं अपने कमरे में अकेली थी।
रात करीब दो बजे होंगे। मेरी वासना फिर से जाग उठी थी। मैं उठी और धीरे से रसोई में गई। वहां से एक बड़ा सा खीरा और केला उठा लाई। मैंने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर लेट गई। इस बार मैंने अपनी साड़ी पूरी तरह उतार दी और नंगी हो गई। मैंने पहले खीरे को अपने मुंह में डालकर उसे चूसा और फिर उसे अपनी चूत में रगड़ने लगी।
मैं वर्जिन विवाहिता हस्तमैथुन करके चरमसुख पाने में इतनी खो गई थी कि मुझे पता ही नहीं चला कि मेरे कमरे का दरवाजा धीरे से खुल गया और मेरे पिता जी ने मुझे हस्तमैथुन करते हुए देख लिया। अचानक मेरी नजर दरवाजे की तरफ गई तो मैं देखती हूँ कि वहां मेरे पापा खड़े हैं और हैरानी से मुझे हस्तमैथुन करके चरमसुख पाने का प्रयास करते हुए देख रहे हैं। मेरे हाथ से खीरा गिर गया और मैं सहम गई। पापा ने कुछ नहीं कहा बस चुपचाप दरवाजा बंद करके चले गए।
पापा का वह सवाल जिसने मेरी पोल खोल दी
अगली सुबह मैं वर्जिन विवाहिता मेरे पिता जी के सामने नहीं जा पा रही थी शर्म के मारे। मेरा मन बहुत भारी था और शर्म से मेरा सिर झुका हुआ था। लेकिन पापा ने मुझे बुलाया और हम दोनों बैठक में अकेले बैठे। पापा ने मेरी तरफ बड़े प्यार से देखा और फिर धीरे से पूछा, “बेटी, कल रात मैंने तुझे देख लिया। मुझे माफ कर दे लेकिन एक बाप अपनी बेटी की ऐसी हालत देखकर चुप नहीं रह सकता। बेटी, ऐसी क्या मजबूरी है कि तू खीरे और केले जैसी चीजों का सहारा ले रही है? क्या दामाद जी तेरी चुदाई नहीं करते?”
मेरे पिता जी के मुंह से यह शब्द सुनकर मैं फूट-फूट कर रोने लगी। इतने दिनों का दर्द, अकेलापन और तड़प एक साथ बाहर निकल आया। मैंने पापा के पैर पकड़ लिए और हिचकियां लेते हुए बोली, “पापा, मैं आज तक वर्जिन हूँ। मेरे पति सुरेश का किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर है। उनके घर वालों ने जबरदस्ती उनकी शादी मुझसे करवाई थी। वह मुझसे नफरत करते हैं। उन्होंने आज तक मुझे छुआ तक नहीं, मेरे साथ एक रात भी नहीं बिताई। मैं अब और नहीं सह सकती पापा। मेरा तन जल रहा है। मैं क्या करूं?”
पापा का फैसला जिसने रिश्तों की परिभाषा बदल दी
मुझ वर्जिन विवाहिता की बात सुनकर मेरे पिता जी की आंखों में आंसू आ गए। उनका चेहरा उतर गया और वह बहुत देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने मेरा चेहरा उठाया और बोले, “बेटी, तूने इतना दर्द अकेले कैसे सहा? तूने हमें बताया क्यों नहीं? एक बाप से बढ़कर इस दुनिया में किसी और की छांव नहीं होती बेटी।” उनकी बातों में इतना प्यार और दर्द था कि मैं और रोने लगी। तभी पापा ने वह कहा जिसकी मैंने कभी कल्पना नहीं की थी। उन्होंने धीरे से कहा, “कोई बात नहीं बेटी, आज मैं तेरे साथ तेरी सुहागरात बनाऊंगा। अगर तेरा पति तुझे वह सुख नहीं दे सकता जो एक पति को देना चाहिए, तो मैं तुझे वह सुख दूंगा। मैं तुझे चोदूंगा और तेरी इस आग को बुझाऊंगा।”
मैं सन्न रह गई। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि यह सही है या गलत। पापा मेरे अपने हैं, उन्होंने मुझे पाला-पोसा है। लेकिन दूसरी तरफ मेरा तन उनकी बात सुनकर तर गया। इतने दिनों के बाद कोई मुझे चोदने को तैयार था। मेरी चूत उनकी बात सुनकर पानी की तरह बहने लगी। मैंने पापा की तरफ देखा और बिना कुछ कहे अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया। यह मेरी मौन सहमति थी उनकी रखेल बनने के लिए। अब हम बाप-बेटी को अंधेरा होने का इंतजार था अब।
पापा के हाथों मेरा पहला स्पर्श और अहसास
रात आई और पूरा घर गहरी नींद में सो गया। पापा धीरे से मेरे कमरे में आए और दरवाजा बंद कर दिया। कमरे में मिट्टी के तेल की लालटेन जल रही थी जिसकी मद्धम रोशनी में पापा का चेहरा बहुत गंभीर और भावुक लग रहा था। वह मेरे पास आए और धीरे से मेरे गालों को सहलाया। उनके हाथों का स्पर्श पहली बार मुझे एक मर्द के हाथों जैसा लगा। मैं काँप उठी। फिर उन्होंने मेरी साड़ी का पल्लू धीरे से हटाया और मेरे कंधों को चूमना शुरू कर दिया। उनके होंठ मेरी गर्दन पर आए और मैं कराह उठी। इतने दिनों बाद किसी के होंठ मेरे तन को छू रहे थे।
उन्होंने मेरी साड़ी पूरी तरह उतार दी और मैं केवल अपने ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी थी। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगे। उनके हाथ काँप रहे थे लेकिन उनमें जुनून था। जैसे ही ब्लाउज खुला मेरे बड़े-बड़े स्तन बाहर निकल आए। मेरे पिता जी ने उन्हें देखा तो उनकी सांसें तेज हो गईं। उन्होंने मेरे एक स्तन को अपने मुंह में ले लिया और जोर से चूसने लगे। “हाय पापा… बहुत मजा आ रहा है… और चूसो मेरे बोबे को,” मैंने आंखें बंद करके कराहते हुए कहा। उनके दांत मेरे चूचुक को काट रहे थे और जीभ उसे सहला रही थी। उनके हाथ दूसरे स्तन को मसल रहे थे।
पापा का लंड और मेरी चूत का पहला मिलन
उन्होंने मेरा पेटीकोट उतारा और मेरी जांघों के बीच की नम घाटी को देखा। वहां से पानी बह रहा था। उन्होंने अपनी उंगली उस पर फिराई और फिर धीरे से मेरी चूत के अंदर डाल दी। “बहुत गीली है तेरी फुद्दी बेटी, बहुत तड़प रही है,” पापा ने कहा। उनकी उंगली मेरे अंदर आगे-पीछे हो रही थी और मैं पागलों की तरह कराह रही थी। फिर उन्होंने अपने कपड़े उतार दिए। उनका लंड सामने आया। वह बहुत बड़ा, मोटा और सीधा खड़ा था।
मेरे पिता जी के लंड का सिरा लाल और चमकदार था। मैंने उसे देखा तो मेरे मुंह में पानी आ गया। इतने बड़े लंड को देखकर मुझे थोड़ा डर भी लगा कि कहीं यह मेरी छोटी सी चूत को फाड़ न दे। पापा मेरे ऊपर लेटे और उन्होंने अपने लंड के सिरे को मेरी सील पैक वर्जिन चूत के छेद पर रखा। “बेटी पहली बार लंड लेने में थोड़ा दर्द होगा लेकिन फिर बहुत सुख मिलेगा,” कहते हुए उन्होंने धीरे से अपना लंड मेरे अंदर दबाना शुरू किया।
मुझे ऐसा लगा जैसे कोई लोहे की सलाख मेरी वर्जिन चूत की सील तोड़ते हुए अंदर घुस रही हो। मैंने दर्द से कराहते हुए उनके कंधों को जोर से पकड़ लिया। “हाय पापा… बहुत दर्द हो रहा है… धीरे से लो… प्लीज धीरे से,” मैंने बुदबुदाया। लेकिन पापा ने एक झटके से अपना पूरा लंड मेरी चूत के अंदर तक धकेल दिया। मैं चीख पड़ी। मेरा कौमारपट्ट टूट गया था। मेरी आंखों से आंसू निकल आए लेकिन साथ ही मेरे अंदर एक अजीब सी खुशी भी भर गई।
पापा के लंड से सील पैक वर्जिन चुदाई का पहला सुख और मेरा चरमसुख
दर्द कम होने लगा और धीरे-धीरे पापा के लंड की हरकतें तेज होने लगीं। उनका लंड मेरी चूत के अंदर आ रहा था और जा रहा था। मेरी चूत उनके लंड को जोर-जोर से चूस रही थी। “हाय पापा… मर गई… बहुत मजा आ रहा है… और जोर से चोदो मुझे… मेरी चूत भर दो अपने लंड से,” मैंने आवेश में आकर चिल्लाना शुरू कर दिया। पापा की सांसें भारी हो रही थीं और उनका चेहरा पसीने से तर था। वह मेरे स्तनों को दबा रहे थे और मुझे जोर-जोर से चोद रहे थे।
उन्होंने मेरी टांगें उठा लीं और उन्हें अपने कंधों पर रख लिया। इस पोजीशन में उनका लंड मेरी टाइट चूत के और अंदर तक चला गया। मैं पागल हो गई। मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं बेहोश हो जाऊंगी। तभी पापा ने मुझे पेट के बल लिटाया और पीछे से मेरी चूत में लंड घुसाने लगे। इस पोजीशन में भी बहुत मजा आ रहा था। वह मेरे बाल पकड़कर मुझे पीछे से जोर-जोर से चोद रहे थे।
मैं चुदते चुदते बहुत ही जायदा जोर-जोर से चिल्ला रही थी, “हां… हां पापा… ओह गॉड… मैं निकल गई… मैं चरम पर पहुंच गई… हाय राम… बहुत मजा आया।” मेरी चूत से रस की धार बह निकली और मैं बिस्तर पर ढेर हो गई। पापा ने भी अपना वीर्य मेरे अंदर ही उंडेल दिया। उनका गर्म पानी मेरी कोख में भर गया। हम दोनों हांफ रहे थे और पसीने से तरबतर थे। यह मेरे जीवन का सबसे सुखद और वर्जित पल था।
चरमसुख पाने के लिए रात भर चला हम बाप-बेटी का गन्दा खेल
उसके बाद हम बाप-बेटी सोए नहीं बल्कि चरमसुख पाने के लिए पूरी रात वासना के खेल में मस्त रहे। पापा ने मुझे कई बार चोदा। कभी मैं ऊपर थी तो कभी वह। एक बार तो पापा ने मुझसे कहा कि वह मेरी गांड भी चोदना चाहते हैं। पहले तो मैं घबराई लेकिन फिर उनके जिद करने पर मान गई।
उन्होंने अपने लंड पर तेल लगाया और मेरी गांड के छेद में धीरे-धीरे दबाना शुरू किया। मुझे बहुत दर्द हुआ लेकिन पापा बहुत प्यार से रुक-रुक कर कर रहे थे। धीरे-धीरे उनका पूरा लंड मेरी गांड में समा गया। यह और भी ज्यादा कसाव वाला सुख था। मेरी गांड उनके लंड को बहुत मजबूती से पकड़ रही थी। पापा मुझे गांड में चोद रहे थे और मैं चीख-चीख कर कराह रही थी।
सुबह होने तक हमने एक-दूसरे को कई बार चरमसुख दिया। पापा ने मेरे मुंह में भी अपना लंड डाला और मैंने उसे बहुत चाव से चूसा। उनका मीठा पानी मेरे गले से नीचे उतर गया। यह रात मेरे जीवन की सबसे यादगार रात बन गई। लेकिन इस रात का अंजाम बहुत भयानक था, जिसका मुझे अंदाजा नहीं था।
चरमसुख पाने के बाद बेटी कोख में पलता पिता का बीज
उस रात के बाद पापा चले गए लेकिन उन्होंने वादा किया कि वह आते रहेंगे। और वह आते भी रहे। हर महीने वह किसी न किसी बहाने आते और रात में मेरे कमरे में आकर मुझे चोदते। उनके साथ मैंने हर तरह के सेक्स का सुख लिया। लेकिन कुछ महीनों बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं गर्भवती हूं। मैं बहुत डर गई। मैंने मेरी प्रेगनेंसी के बारे में मेरे पिता जी को बताया तो वह भी हैरान रह गए। उन्होंने कहा कि यह बच्चा हमारे प्यार की निशानी है बेटी लेकिन अगर दामाद जी को पता चल गया की तुम्हेरे पेट में जो बच्चा पल रहा है वो उसका नहीं बल्कि उसके ससुर का है तो बहुत बड़ी मुसीबत होगी।
लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। एक दिन मेरे पति सुरेश को मेरी प्रेगनेंसी के बारे में सब कुछ पता चल गया। वह मुझ पर टूट पड़ा और उसने मुझे बुरी तरह पीटा। वह चिल्ला रहा था, “बता किसके बच्चे से तू पेट से है? मैंने तो कभी तुझे छुआ तक नहीं साली छिनाल। कहां गई तेरी इज्जत? तूने मेरा नाम डुबो दिया।” मैंने उसे पापा के बारे में नहीं बताया बल्कि चुप रही। इससे वह और भी ज्यादा गुस्सा हो गया। उसने मुझे तुरंत तलाक दे दिया और मुझे घर से निकाल दिया।
पापा की रखैल बनकर बिताई जिंदगी और अब का हाल
जब मैं मायके पहुंची और मां को सारी बात बताई तो उन्होंने भी मेरा त्याग कर दिया। वह नहीं समझ पाईं कि उनके पति ने उनकी बेटी के साथ ऐसा क्यों किया। घर में कलह मच गई। लेकिन पापा ने मेरा साथ नहीं छोड़ा। वह मुझे लेकर दूसरे शहर में जाकर बस गए। अब मैं उनके साथ रहती हूं और उनकी रखैल हूं। मेरा कोई सामाजिक दर्जा नहीं है लेकिन मैं खुश हूं क्योंकि मुझे वह शारीरिक सुख मिल रहा है जिसके लिए मेरा तन तरस रहा था। पापा मुझे रोज चोदते हैं और मेरी हर जरूरत का ख्याल रखते हैं।
मैंने एक बेटी को जन्म दिया जो बहुत खूबसूरत है। पापा उसे बहुत प्यार करते हैं। हम एक परिवार की तरह रहते हैं लेकिन इस परिवार की असली सच्चाई कोई नहीं जानता। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि काश मेरी शादी सही इंसान से हुई होती तो मुझे अपने पिता की शरण नहीं लेनी पड़ती। लेकिन अब जो हुआ सो हुआ। अब मैं पापा की हूं और पापा मेरे हैं। यह हमारा अपना संसार है, चाहे दुनिया इसे अवैध कहे या वर्जित।
Hindi Father Daughter Incest Sex Kahani – निष्कर्ष
यह सेक्स कहानी एक ऐसी विवाहिता की दास्तान है जिसे उसके पति ने शारीरिक सुख से वंचित रखा और मजबूर होकर उसे अपने पिता की शरण लेनी पड़ी। रागिनी की अन्तर्वासना ने उसे वह रास्ता दिखाया जो समाज की दृष्टि में सबसे वर्जित है। यह कहानी सिर्फ सेक्स की भूख को शांत करने की नहीं है बल्कि एक स्त्री के अकेलेपन, उसकी तड़प और उसकी मजबूरी की कहानी है।
पिता ने एक बाप न होकर एक मर्द की तरह अपनी बेटी की जरूरत पूरी की, जो कि नैतिकता की दृष्टि से गलत है लेकिन मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर एक अलग ही सच्चाई को उजागर करता है। रागिनी के जीवन का यह अध्याय दर्शाता है कि कैसे सामाजिक बंधन टूट जाते हैं जब इंसान की मूलभूत आवश्यकताएं दब जाती हैं और उसे कोई और रास्ता नहीं दिखता।


