यह अन्तर्वासना हिंदी सेक्स स्टोरी “खेत दिखाने के बहाने ताऊ जी ने पूरे लंड को मेरी माँ की टाइट चूत में घुसा दिया” राज और उसकी माँ की गाँव की यात्रा की है, जहाँ ताऊ जी के साथ माँ का अनैतिक और कामुक रिश्ता सामने आता है। पिता के काम में व्यस्त होने के कारण माँ और राज गाँव जाते हैं। वहाँ ताऊ जी और माँ के बीच की नजदीकियाँ राज की नजरों में आती हैं। खेतों में छिपकर देखते हुए राज को उनकी कामुक हरकतों और निषिद्ध प्रेम का पता चलता है। यह कहानी वासना, रहस्य और पारिवारिक रिश्तों की जटिलता को दर्शाती है।
मेरा नाम राज है। हमारे परिवार में मैं, मेरी माँ और पापा हैं। पापा सेल्समैन हैं, जो अक्सर कई दिनों तक घर से बाहर रहते हैं और इस वजह से ही मेरी माँ की अन्तर्वासना शांत नहीं हो पाती हा और मजबूरन उन्हें हस्तमैथुन करके अपनी कामवासना शांत करनी पड़ती है। हमारा गाँव, जहाँ हमारे सारे रिश्तेदार रहते हैं, शहर से काफी दूर है। साल में दो-तीन बार ही हम वहाँ जाते हैं। मेरे ताऊ जी, जिनकी उम्र साठ साल है, गाँव में अकेले रहते हैं। उनकी पत्नी का देहांत हो चुका है। इस बार नवरात्रि में हम गाँव जाने वाले थे। पापा को कुछ काम आ गया, तो उन्होंने मुझे और माँ को अकेले जाने को कहा।
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माँ ने हँसते हुए कहा, “ठीक है, हम चले जाएँगे।” उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। फिर, माँ ने जल्दी-जल्दी सामान पैक करना शुरू कर दिया। मुझे लगा कि माँ को गाँव जाने की असामान्य उत्सुकता थी। हम सुबह की ट्रेन से गाँव पहुँचे। ताऊ जी हमें लेने स्टेशन आए थे। माँ उन्हें देखकर खिल उठीं, और ताऊ जी भी मुस्कुराए। उन्होंने पूछा, “परिमल नहीं आया?” माँ ने जवाब दिया, “उनका कुछ काम है, वो बाद में आएँगे।” उनकी नजरें एक-दूसरे पर टिकी थीं।
बैलगाड़ी में माँ और ताऊ के बीच की छिपी नजदीकियाँ
हम बैलगाड़ी में बैठकर घर की ओर चल पड़े। ताऊ जी ने मुझसे कहा, “बेटा, तू बैलगाड़ी चला।” मैंने सहमति में सिर हिलाया और आगे बैठ गया। माँ और ताऊ जी पीछे बैठे। कुछ देर बाद, मैंने माँ की हल्की सी आवाज सुनी। पीछे मुड़कर देखा तो ताऊ जी का पैर माँ की साड़ी के पास था। माँ ने तुरंत कहा, “राज बेटा, सामने देखकर बैलगाड़ी चला!” मुझे कुछ शक हुआ, किंतु मैं चुप रहा। घर पहुँचते ही माँ बाथरूम में चली गईं और थोड़ी देर बाद बाहर आईं।
ताऊ जी ने उत्साह से कहा, “चलो, अब तुम्हें खेत दिखाता हूँ।” माँ ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हाँ, चलिए मुझे भी खेत घुमने का बड़ा मन हो रह है।” मैं भी उनके साथ खेतों की तरफ चल पड़ा। खेतों में पहुँचकर मैंने देखा कि ताऊ जी का हाथ माँ की कमर पर फिसल रहा था। माँ ने धीरे से कहा, “लड़का यहीं है, वो देख लेगा तो अनर्थ हो जायगा।” ताऊ जी ने मुझे दूर जाने को कहा, “बेटा, तू वहाँ जाकर खेल। मुझे तुम्हारी माँ से कुछ जरुरी बात करनी है अकेले में।” माँ ने भी मुझे जाने का इशारा किया।
अन्तर्वासना शांत करने के लिए हरे भरे खेत में छिपा निषिद्ध प्रेम
मैं वहाँ से हट गया, लेकिन माँ और ताऊ जी पर शक के कारण चोरी छिपे उनके पीछे-पीछे गया, दोस्तों मुझे पूरा यकीन था की वहा दोनों आज खेत में अपनी अन्तर्वासना शांत करने के लिए चुदाई जरुर करेंगे। माँ और ताऊ जी इधर उधर देखते हुए खेत में लगे एक बड़े से पेड़ की आड़ में चले गए। मेरी कामुकता से भरी माँ पेड़ के मोटे तने से सटकर खड़ी हो गईं। ताऊ जी ने अपना हाथ माँ की साड़ी में डाला, और माँ ने भी उनकी मदद की। मैं और करीब गया ताकि उनकी बातें सुन सकूँ। माँ कह रही थीं, “कितने दिन बाद मुझे ऐसा तगड़ा लंड मिला है। परिमल का तो बेकार है।” ताऊ जी ने माँ की चूत को दोनों हाथों से फैलाया। माँ ने हल्का विरोध किया, लेकिन उनकी आँखों में सहमति साफ थी।
इसके बाद, ताऊ जी ने अपना खड़ा लंड मेरी माँ की टाइट चूत पर सटाया और एक हल्का झटका मारा। माँ के मुँह से “आह्ह्ह” की आवाज निकली। मैं समझ गया कि ताऊ जी का लंड माँ की चूत में घुस गया था। ताऊ जी ने जोर-जोर से झटके मारने शुरू किए। हर झटके के साथ माँ की सिसकारियाँ तेज होती गईं, “आआआह्ह्ह!” ताऊ जी ने माँ की चूचियों को मसलना शुरू किया, जिससे माँ का जोश और बढ़ गया। लगभग आधे घंटे की चुदाई के बाद ताऊ जी का बीज माँ की चूत में गिरा। माँ संतुष्ट दिख रही थीं।
हरे भरे खेत दिखाने के बहाने ताऊ ने माँ की टाइट चूत में पूरा लंड घुसा दिया और चुदाई करी
माँ उठकर जाने लगीं, लेकिन ताऊ जी ने उन्हें रोक लिया। “कहाँ जा रही हो?” उन्होंने पूछा। माँ ने कहा, “आज के लिए बस!” किंतु ताऊ जी ने कहा, “अभी तो और चुदाई बाकी है।” फिर, ताऊ जी ने माँ की गाँड पर लंड सटाया और एक जोरदार झटका मारा। दर्द के मारे मेरी माँ की चीख निकल गई, “आआआह्ह्ह!” मैं समझ गया कि लंड उनकी गाँड में घुस गया था। ताऊ जी ने गांड चुदाई करने के दौरान बड़ी तेजी से अपनी कमर हिलाई और दस मिनट बाद शांत हो गए। उनका वीर्य रूपी बीज मेरी माँ की गाँड में गिर चुका था।
ताऊ जी ने माँ की चूत को देखा और पूछा, “पेशाब नहीं करोगी?” माँ ने मना किया। फिर, ताऊ जी ने अपना लंड दोबारा माँ की चूत पर सटाया। माँ ने अपनी चूत को दोनों हाथों से फैलाया। ताऊ जी ने एक जोरदार झटके के साथ लंड अंदर घुसा दिया। माँ की सिसकारियाँ फिर शुरू हो गईं, “आआआह्ह्ह… धीरे… उईईई!” ताऊ जी पर इसका कोई असर नहीं था। वो छोटे-बड़े झटकों के साथ चुदाई करते रहे। माँ ने कहा, “और अंदर मत डालो, मेरी चूत फट जाएगी।” ताऊ जी ने जवाब दिया, “अभी तो आधा बाहर है।”
मेरी बेचारी माँ की हर कोशिश को नाकाम करते हुए ताऊ जी ने अपने पूरे लंड को मेरी माँ की टाइट चूत में घुसा दिया और खेत में उनकी जमकर चुदाई करी । माँ की चूचियाँ मसली जा रही थीं, और अब उन्हें भी मजा आने लगा था। पैंतीस मिनट की तीव्र चुदाई के बाद दोनों थककर शांत हो गए। ताऊ जी का बीज फिर माँ की चूत में गिरा। दोनों ने कपड़े पहने और खेत से घर की ओर चल पड़े। मैंने ऐसा दिखाया कि मुझे कुछ पता नहीं। ताऊ जी माँ को देखकर मुस्कुराए, और मैं चुप रहा। यह निषिद्ध रिश्ता मेरे लिए एक रहस्य बनकर रह गया, जो गाँव की उस रात में छिपा था।


