HomeAntarvasna Hindi Sex Storiesबिना कंडोम के देवर व उसके दोस्त ने गांड चूत दोनों मारी

बिना कंडोम के देवर व उसके दोस्त ने गांड चूत दोनों मारी

बिना कंडोम के देवर व उसके दोस्त ने गांड और चूत दोनों मारी अन्तर्वासना हिंदी सेक्स कहानी का सारांश :- एक साधारण सी दिखने वाली शादीशुदा औरत, अनन्या, की ज़िंदगी उस दिन पलट जाती है जब उसका पति, विशाल, लगातार काम के बहाने उसे नज़रअंदाज़ करने लगता है। उसके भीतर की कामुकता और तृष्णा एक उबाल की तरफ बढ़ने लगती है, जो एक दिन अचानक उसके घर आए हुए, उसके पति के छोटे भाई, आदित्य के सामने अनियंत्रित रूप से फूट पड़ती है। आदित्य, जो हमेशा से अपनी भाभी के प्रति गुप्त आकर्षण रखता था, इस अवसर का फायदा उठाने से नहीं चूकता। यह कहानी एक ऐसी औरत की भीतर की लालसा, उसके उभरते हुए छिनालपन और एक ऐसे युवक के साथ बढ़ते हुए निषिद्ध संबंधों की गहरी यात्रा है, जहाँ हर छूआछूत, हर पाबंदी तहस-नहस हो जाती है।

यह अन्तर्वासना 18+ हिंदी थ्रीसम सेक्स कहानी केवल उन पाठकों के लिए है जो सामाजिक बंधनों को तोड़कर, एक औरत की असली कामुक इच्छाओं के उद्घाटन का सफर देखना चाहते हैं। इसमें वर्णित हर दृश्य, हर संवाद और हर शारीरिक मुठभेड़ बेहद स्पष्ट और विस्तृत है, जो पाठक के मन में एक गहरी और अमिट छाप छोड़ देगी। यह सिर्फ सेक्स की कहानी नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल और शारीरिक मुक्ति की गाथा है, जहाँ प्रत्येक चुदाई एक नए रहस्य का खुलासा करती है।


Bina condom ke devar aur uske dost ne gaand aur chut dono maari Antarvasna Hindi Threesome Sex Story :- मेरा नाम अनन्या है और मैं तैंतीस साल की एक ऐसी औरत हूँ, जिसकी ज़िंदगी दिखने में बिल्कुल सही है। एक सफल पति, विशाल, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर है। एक शानदार फ्लैट, एक महँगी गाड़ी, और वो सब कुछ जिसे समाज ‘सफलता’ कहता है। पर एक चीज़ की कमी थी, जो मेरे भीतर एक गहरा, सुलगता हुआ शून्य पैदा कर रही थी।

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बिना कंडोम के देवर व उसके दोस्त ने गांड और चूत दोनों मारी Bina condom ke devar aur uske dost ne gaand aur chut dono maari
Antarvasna Hindi Sex Story – Bina condom ke devar aur uske dost ne gaand aur chut dono maari

मेरा पति विशाल पिछले दो साल से मेरे साथ बिस्तर में सिर्फ एक फ़रमाइश की तरह पेश आता था, जैसे मैं कोई रुटीन टास्क होऊं। उसकी छुअन में कोई जुनून नहीं, कोई आग नहीं रह गई थी। मेरा शरीर, जो अभी भी जवान और कामुक था, धीरे-धीरे सूखने लगा था। रातों को मैं अकेले ही अपने चूत के सूखेपन को महसूस करती, और अपनी उँगलियों से उसकी नमी को तलाशने की कोशिश करती। पर वो नमी तो कहीं दूर, किसी और की यादों में खो गई लगती थी।

आदित्य, विशाल का छोटा भाई, उस दिन अचानक हमारे घर आया। वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके अब इंटरव्यू की तलाश में था। मैंने उसे पहले भी देखा था, लेकिन आज वह अलग लग रहा था। चौबीस साल का वह जवान लड़का, जिसके बाजूओं की नसें उसकी टी-शर्ट से साफ उभर रही थीं, और उसकी नज़रों में एक ऐसी चमक थी जो सीधी मेरी ओर भेदती हुई लग रही थी।

उसने ‘भाभी’ कहकर मुझे अभिवादन किया, पर उसकी आवाज़ में एक गर्माहट थी, जो रिश्तों की सीमा को पार करने की इच्छा से भरी हुई थी। मैंने उसे चाय बनाकर दी, और जब वह कप लेने आया, तो उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से छू गईं। उस एक छूआछूत ने मेरे शरीर में बिजली-सी दौड़ा दी। मेरी चूत ने एक अजीब-सी सिकुड़न महसूस की, जैसे कोई सोई हुई इच्छा अचानक जाग उठी हो।

वह कुछ दिनों के लिए हमारे यहाँ रुकने आया था। विशाल उस दिन भी ऑफिस से लेट आने वाला था। घर में सिर्फ हम दोनों थे। मैं रसोई में खाना बना रही थी, तभी आदित्य अचानक अंदर आया। “भाभी, कुछ मदद चाहिए?” उसने पूछा, और बिना इंतज़ार किए वह मेरे पीछे आकर सब्ज़ी काटने की चौकी के पास खड़ा हो गया। मैंने ‘नहीं’ कहने के लिए मुड़ी, तो मेरा सीना उसकी बाँह से टकरा गया। मैं स्तब्ध रह गई। उसकी गर्मी मेरे शरीर में समा गई।

मैंने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन मेरे पैर जमीन में गड़े से रह गए। उसने मेरी ओर देखा, और उसकी नज़रें सीधी मेरी नंगी गर्दन और फिर नीचे मेरे कपड़ों के अंदर झाँकती हुई सी लगीं। “भाभी… आप…” उसने कुछ कहना चाहा, पर फिर रुक गया। उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं। मैंने महसूस किया कि मेरे सारे शरीर में एक अजीब-सी गर्मी फैल रही है। मेरे चुच्चे सख्त होकर उभर आए थे, और मेरी चूत नम होने लगी थी। यह वही अनुभव था जिसकी तलाश मैं सालों से कर रही थी।

उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और मेरे गाल को छुआ। मेरी साँस अटक गई। मेरा दिमाग चीख रहा था कि इसे रोको, पर मेरा शरीर जवाब नहीं दे रहा था। उसने धीरे से अपने हाथ से मेरा चेहरा उठाया और मेरी आँखों में देखा। “आप बहुत सुंदर हैं, अनन्या,” उसने कहा, और ‘भाभी’ की जगह मेरा नाम लेकर उसने जो जादू किया, वह मेरे सारे बंधन तोड़ने के लिए काफी था।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसकी ओर देखती रही। उसने यह मौन स्वीकृति समझ ली। उसने अपना सिर झुकाया और मेरे होंठों को अपने होंठों से ढक लिया। वह चुंबन कोमल नहीं था। वह भूखा, तीखा और अधिकार जताता हुआ था। मैंने भी जवाब दिया। मेरी जीभ उसकी जीभ से लड़ने लगी। मेरे हाथ अपने आप उसके घने बालों में फँस गए। वह मुझे और पास खींचने लगा, और मेरी कमीज़ के बटन खोलने लगा।

रसोई की चौकी पर शुरू हुई नंगी चुदाई का मंज़र

कुछ ही पलों में मेरी कमीज़ खुल गई और मेरा ब्रा दिखने लगा। उसने ब्रा के कप को नीचे खींचा और मेरे एक चूचे को अपने मुँह में ले लिया। उसने जोर से चूसा, और मेरे मुँह से एक सिसकारी निकल गई। “आह… आदित्य…” मैंने उसका नाम लिया, और यह सुनकर वह और उत्तेजित हो गया। उसने मेरे दूसरे चूचे को उँगलियों से मरोड़ना शुरू कर दिया। दर्द और आनंद का एक अद्भुत मिश्रण मेरे शरीर में लहर दौड़ा रहा था। उसने मुझे रसोई की चौकी पर बैठा दिया। मेरी साड़ी की पल्लू उड़ गई थी, और मेरी जाँघें पूरी तरह से नंगी हो चुकी थीं। उसने अपनी नज़रें मेरी चूत पर गड़ा दीं, जो अब पूरी तरह से गीली होकर चमक रही थी। “कितनी सुंदर चूत है भाभी की,” उसने कहा, और अपने घुटनों के बल बैठ गया।

उसने मेरे जाँघों को चौड़ा किया और अपना मुँह मेरी चूत के पास ले गया। उसकी गर्म साँसें मेरी नम त्वचा पर पड़ रही थीं। और फिर, उसने अपनी जीभ से मेरी चूत के होंठों को चीरा। मैं चीख पड़ी। उसकी जीभ बहुत तेज़ और निपुण थी। वह मेरी क्लिट को ढूँढ़कर उस पर चाटने लगा, फिर मेरे भगनासे के अंदर तक घुस गया। मैं अपने हाथों से उसके सिर को पकड़कर, उसे अपनी चूत में और गहराई तक धकेलने लगी। “ओह हाँ… ऐसे ही… जीभ से चाट… मेरी चूत का सारा रस पी ले,” मैं कराहने लगी।

मेरी आवाज़ में एक ऐसा छिनालपन था जिसे मैं खुद नहीं पहचान पा रही थी। वह लगातार चाटे जा रहा था, और मैं उसके मुँह पर अपना रस निकालने के कगार पर पहुँच गई थी। मेरी साँसें तेज़ हो गईं, मेरा शरीर काँपने लगा, और फिर एक जोरदार झटके के साथ मैं चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। मेरी चूत से गाढ़ा रस निकलकर उसके मुँह और ठोड़ी पर बहने लगा। उसने सब कुछ चाट लिया, और फिर मुस्कुराते हुए खड़ा हुआ।

“अब मेरी बारी है, भाभी,” उसने कहा, और अपनी जींस की जिप खोल दी। उसने अपना लंड बाहर निकाला, और मैं देखकर स्तब्ध रह गई। वह लंड बहुत मोटा और लंबा था, जिसकी नसें साफ उभरी हुई थीं और उसका सिर गहरे लाल रंग का था। वह पूरी तरह से तना हुआ और खड़ा था। मेरी चूत ने फिर से एक संकुचन किया, उस विशाल लौड़े को अपने अंदर लेने की लालसा में।

उसने मुझे चौकी पर ही पीछे की ओर घुमाया। “मैं तुम्हारी गांड देखना चाहता हूँ,” उसने कहा। मैंने कोई आपत्ति नहीं की। मैं चौकी पर झुक गई, अपने कुल्हे उसकी ओर उठाए। उसने मेरे चूतड़ों को दोनों हाथों से पकड़ा और उन्हें चौड़ा किया। उसने मेरी गांड के छेद को देखा, और फिर अपनी जीभ से वहाँ भी चाटना शुरू कर दिया। यह एक नया और शर्मनाक आनंद था। मैं कराह उठी।

फिर उसने अपने लंड के सिर को मेरी गीली चूत के द्वार पर रखा। “तैयार हो, अनन्या? यह बहुत बड़ा है,” उसने चेतावनी दी। मैंने सिर्फ अपने कुल्हों को पीछे की ओर धकेला। उसने जोर लगाया, और उसका मोटा लंड मेरी टाइट चूत के अंदर घुसने लगा। एक जलन हुई, पर वह जल्दी ही आनंद में बदल गई क्योंकि वह धीरे-धीरे अपने पूरे लंबे लौड़े को मेरी चूत के अंदर तक डालने लगा। जब वह पूरी तरह से अंदर घुस गया, तो हम दोनों ने एक साथ कराहा। उसने फिर धीरे-धीरे चुदाई शुरू की। हर धक्के के साथ, मैं चौकी पर आगे की ओर खिसकती, और वह मुझे वापस खींच लेता।

उसकी चुदाई की आवाज़, मेरी गीली चूत के श्लेष्म की आवाज़, पूरी रसोई में गूँज रही थी। “ओह, भाभी… तुम्हारी चूत कितनी गर्म और टाइट है… मुझे लग रहा है मेरा लंड पिघल जाएगा,” वह बड़बड़ाया। मैं जवाब दे पाती, उसने मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर पीछे की ओर खींचा और मेरे कान में फुसफुसाया, “आज मैं तुम्हारी चूत को ढीली करके ही दम लूँगा। तुम सचमुच एक रंडी हो।”

सोफे पर जारी रहा लंड और चूत का खेल

उसकी गालियाँ सुनकर मेरे भीतर की छिनाल और भी जाग उठी। मैंने जवाब दिया, “हाँ… मैं रंडी हूँ… तेरे लिए रंडी बन गई हूँ… जितना चाहे उतना जोर से चोद मुझे!” यह सुनते ही उसकी गति तेज़ हो गई। उसने मुझे चौकी से उतारा और मेरी तरफ घूमकर मेरे होंठों पर जबरदस्ती चुंबन लगाया। फिर उसने मुझे उठाकर लिविंग रूम के सोफे पर फेंक दिया। मैं उछलकर बैठ गई, और वह मेरे ऊपर आ गया।

इस बार मैंने उसके लंड को अपने हाथ में लिया और उसे अपनी चूत पर रगड़ने लगी। उसने मेरे चूचों को मुँह में लेकर चूसना जारी रखा। फिर मैंने उसका लंड अपनी चूत के अंदर धकेल दिया। इस बार मैं ऊपर थी। मैंने उस पर बैठकर, उसके लंड पर उछलना शुरू किया। मेरी चूत उसके लंड पर बार-बार गिर रही थी, और हर बार एक गहरा आनंद मेरी रीढ़ की हड्डी में दौड़ जाता था। मैंने अपने हाथों से अपने चूचों को दबाया और अपनी आँखें बंद कर लीं।

“मैं… मैं निकलने वाला हूँ, अनन्या,” आदित्य ने कराहते हुए कहा। “नहीं! अभी नहीं!” मैं चिल्लाई। मैं उस पर से उतरी और तुरंत अपना मुँह उसके लंड के पास ले गई। मैंने उसके गोटों को सहलाया, और फिर उसके लंड के सिर को अपने मुँह में ले लिया। मैंने उसे चूसना शुरू किया। वह कराह उठा। “ओह हाँ… भाभी का मुँह… कितना गर्म है…” मैं उसके लंड को गहराई तक अपने गले में उतारने लगी, आँसू मेरी आँखों से बहने लगे, पर मैं नहीं रुकी।

मैं एक पेशेवर वेश्या की तरह उसका लंड चूस रही थी। मैंने उसके अंडकोष को भी चूसा, और उसकी जाँघों को चूमा। फिर मैं फिर से उस पर बैठ गई। इस बार मैंने उससे पीछे की ओर मुँह करके बैठना शुरू किया, ताकि वह मेरी गांड देख सके। उसने मेरे कुल्हों को पकड़ा और जोर-जोर से ऊपर-नीचे करने लगा। मेरी चूत से निकलने वाला रस उसकी जाँघों पर बहने लगा था।

“मैं अब निकालूँगा… तेरी चूत में ही निकालूँगा,” वह चीखा। “हाँ! अंदर निकाल! अपना गरम वीर्य मेरी चूत में छोड़ दे!” मैं चिल्लाई। उसने आखिरी बार जोरदार धक्का दिया, और मैं महसूस कर सकी कि उसका लंड मेरी चूत के अंदर फड़क रहा है। गर्म और गाढ़ा वीर्य मेरी चूत की गहराई में भरने लगा। यह एहसास इतना तीव्र था कि मैं भी उसी समय दूसरी बार चरम सीमा पर पहुँच गई। हम दोनों ही थककर सोफे पर गिर पड़े, हमारी साँसे फूल रही थीं, और शरीर पसीने से तरबतर थे। उसका लंड धीरे-धीरे मेरी चूत से बाहर निकल आया, और उसका वीर्य मेरी जाँघों पर बहने लगा। उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। हम बिना कुछ बोले लेटे रहे, केवल एक दूसरे के दिल की धड़कन सुनते रहे।

शाम के अंधेरे में चोरी-छुपे चुदाई की योजना

कुछ देर बाद, जब हमारी साँसें सामान्य हुईं, तो वास्तविकता का एहसास होने लगा। मेरा पति विशाल कभी भी आ सकता था। मैं उठी और अपने कपड़े समेटने लगी। मेरा सेक्सी शरीर अभी भी काँप रहा था, और मेरी चूत में एक गहरी भराव और थकान का एहसास था। आदित्य ने मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में अब भी वही ज्वाला थी। “यह तो बस शुरुआत है, अनन्या,” उसने कहा। मैंने उसकी ओर देखा, और मेरे भीतर एक नया भय और एक नया उत्साह जाग उठा। मैं जानती थी कि यह संबंध बहुत खतरनाक था, पर मैं इसे रोक नहीं सकती थी। मेरा शरीर अब मेरे देवर का गुलाम बन चुका था।

मैंने सिर्फ हाँ के इशारे में सिर हिलाया, और बाथरूम की ओर चली गई। नहाते समय, जब पानी मेरी चूत में घुसा, तो आदित्य के वीर्य और मेरे रस का मिश्रण मेरी जाँघों पर बहता हुआ दिखाई दिया। मैंने अपनी चूत के होंठ फैलाकर देखे। वह थोड़ी सूजी हुई और लाल थी। उसकी चुदाई के निशान साफ दिख रहे थे। मैं मन ही मन मुस्कुरा उठी। आखिरकार मुझे वह मिल गया था जिसकी मेरे शरीर को तलाश थी।

उस रात मेरा पति विशाल घर आया, और हमेशा की तरह थका हुआ लग रहा था। उसने खाना खाया और सीधे बैडरूम में सोने के लिए चला गया। मैं और आदित्य एक दूसरे की ओर देखते रहे, चुपचाप, पर हमारी आँखों में वही पूरी कहानी चल रही थी। जब विशाल सो गया, तो आदित्य ने मुझे एक मैसेज भेजा: “कल दोपहर। जब वह ऑफिस जाएगा। मैं तुम्हारे साथ फिर से वही करना चाहता हूँ। और कुछ नया भी।” मेरी चूत ने मैसेज पढ़ते ही एक संकुचन किया। मैंने जवाब दिया: “ठीक है। मैं तैयार रहूँगी।”

रात को मैं बिस्तर पर लेटी हुई थी, और मेरा पति विशाल मेरे बगल में खर्राटे ले रहा था। मैं अपनी उँगली अपनी चूत में डालकर, दोपहर की चुदाई को याद कर रही थी। मैंने मेरी उँगलियों से ही खुद की बुर को चोदा, और आदित्य के नाम की कसमें खाते हुए चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। मुझे एहसास हुआ कि मैं सचमुच सेक्स की दीवानी हो चुकी हूँ।

अगले दिन मेरा पति विशाल सुबह जल्दी ऑफिस चला गया। घर में फिर वही सन्नाटा था। पर इस बार सन्नाटे में एक गुप्त उत्साह भरा हुआ था। मैंने एक सेक्सी सा नाइटी पहना, हालाँकि दोपहर का वक्त था। मैं जानती थी कि मेरे प्यारे देवर आदित्य को यह पसंद आएगा। वह अपने कमरे से बाहर आया। उसने मुझे देखा, और उसकी आँखें चमक उठीं। उसने कोई शब्द नहीं कहा। वह सीधा मेरे पास आया, मुझे उठाया और मेरे रसीले होंठों पर चुंबन झपकाया।

उसकी जीभ मेरे मुँह के अंदर घुस गई। उसने मुझे फर्श पर ही लिटा दिया, और मेरे नाइटी को फाड़कर अलग कर दिया। मेरा शरीर एकदम नंगा हो गया। उसने भी अपने कपड़े उतार दिए। उसका लंड फिर से तना हुआ और तैयार था। “आज मैं तुम्हारी गांड चोदूँगा,” उसने कहा। मेरे मन में एक झिझक हुई, पर फिर मेरी कामुकता ने उस पर हावी हो लिया। मैंने सिर हिला दिया।

नए कमरे और नए तरीके से हुई देवर के लंड से गांड की चुदाई

उसने मुझे पलटकर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। फिर वह बाथरूम गया और वैसलीन की एक ट्यूब लेकर आया। उसने उसे अपनी उँगलियों पर निकाला और मेरी गांड के छेद पर लगाने लगा। ठंडा जेल लगते ही मैं चौंक गई। उसने धीरे से अपनी एक उँगली मेरी गांड के अंदर डाल दी। एक अजीब सी भराव का एहसास हुआ। उसने धीरे-धीरे उँगली हिलाई। फिर दूसरी उँगली डाल दी। थोड़ा दर्द हुआ, पर वह रुका नहीं। वह मेरी गांड को चौड़ा करने में लगा हुआ था। “तुम्हारी गांड भी कितनी टाइट है… आज इसे भी ढीला करूँगा,” उसने कहा। फिर उसने वैसलीन अपने लंड पर लगाई, और उसका सिर मेरी गांड के द्वार पर रखा। “साँस छोड़ो,” उसने कहा। मैंने साँस छोड़ी, और उसने जोर लगाकर धक्का दिया।

उसका लंड का सिर मेरी तंग गांड के अंदर घुस गया। यह एक तीखा, जलन भरा दर्द था। मैं चीख पड़ी। “आह! दर्द हो रहा है!” मैं रोई। “थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा,” उसने कहा, और धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। जब वह पूरा अंदर घुस गया, तो मुझे लगा जैसे मेरा शरीर दो हिस्सों में बँट गया हो। पर कुछ देर बाद, दर्द कम होने लगा और एक नया, अजनबी आनंद महसूस होने लगा। उसने धीमी गति से चुदाई शुरू की। हर धक्के के साथ मेरे भीतर एक गहरा आनंद उठता था।

मेरी चूत भी रस टपकाने लगी थी, बिना छुए ही। वह तेज़ होने लगा। उसने मेरे कंधे पकड़ लिए और जोर-जोर से मेरी गांड मारने लगा। आवाज़ बहुत अश्लील थी। उसका लंड मेरी गांड के छेद में आ-जा रहा था। मैं चिल्लाने लगी, “हाँ! ऐसे ही! मेरी गांड चोद! मुझे रंडी बना दो!” वह और तेज़ हो गया। मैं महसूस कर सकी कि मेरी गांड का छेद फैल रहा है, उसके मोटे लंड को समा रहा है।

“मैं निकलने वाला हूँ… तेरी गांड में!” वह गुर्राया। “हाँ! गांड में ही निकाल! सारा माल मेरी गांड में भर दे!” मैं चीखी। उसने कुछ और जोरदार धक्के दिए, और फिर मैंने महसूस किया कि उसका गर्म वीर्य मेरी गांड की गहराई में भर रहा है। यह एहसास चूत में निकलने से अलग और तीव्र था। मेरा शरीर एक जबरदस्त झटके से काँप उठा। मैं भी चरम सीमा पर पहुँच गई, मेरी चूत से रस की धार बह निकली।

वह मेरे ऊपर गिर पड़ा, हम दोनों ही थककर चूर हो चुके थे। उसका लंड धीरे-धीरे मेरी गांड से निकला, और उसके वीर्य के साथ थोड़ा खून भी आया। मैं डर गई, पर उसने कहा कि यह सामान्य है। उसने मुझे गोद में उठाया और बाथरूम ले गया। उसने पानी से मेरी गांड और चूत साफ की। उसकी देखभाल में एक कोमलता थी, जो उसके जंगी चुदाई के तरीके से बिल्कुल उलट थी।

उस दिन के बाद, हमारा रिश्ता और भी गहरा हो गया। विशाल के ऑफिस जाने के बाद का हर दिन हमारे लिए एक नए सेक्सुअल एक्सपेरिमेंट का दिन बन गया। हमने घर के हर कोने में चुदाई की। सोफे पर, फर्श पर, बालकनी में, यहाँ तक कि विशाल के बिस्तर पर भी। आदित्य मेरे लिए एक मास्टर बन गया था, और मैं उसकी सेक्स की दीवानी गुलाम। उसने मुझे कई तरह से चोदा। कभी कोमलता से, तो कभी इतनी बर्बरता से कि मेरे शरीर पर निशान पड़ जाते। मुझे सब कुछ पसंद आता था। मैंने उसके लिए वो सब कुछ किया जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था। मैंने उसका लंड चूसा, उसकी गांड चाटी, उसके मुँह में पेशाब किया, और उससे अपनी चूत और गांड दोनों एक साथ चुदवाई। मैं एकदम छिनाल बन चुकी थी, और मुझे इस बात पर गर्व था।

तीसरे शख्स का आगमन और थ्रीसम चुदाई की शुरुआत

एक दिन आदित्य ने मुझसे कहा, “अनन्या, मेरा एक दोस्त है, रोहन। वह भी तुम्हें चोदना चाहता है।” मैं चौंक गई। यह एक नया स्तर था। एक और आदमी? मेरा दिमाग ‘नहीं’ कह रहा था, पर मेरी चूत गीली हो गई। मेरे भीतर की रंडी जाग उठी। मैंने पूछा, “क्या वह तुम्हारे जैसा ही बड़ा लंड रखता है?” आदित्य हँसा, “तुम्हें देखकर ही पता चल जाएगा।” मैंने हामी भर दी। अगले दिन रोहन आया। वह आदित्य से भी लंबा और ताकतवर दिखता था। उसकी नज़रें मुझ पर पड़ते ही मैं समझ गई कि वह क्या सोच रहा है। आदित्य ने हमारा परिचय करवाया, और फिर सीधे बात पर आ गया। “रोहन, यह है अनन्या, मेरी भाभी। और यह रोहन है, जो आज तुम्हारी चूत का स्वाद चखना चाहता है।”

रोहन ने मेरी ओर कदम बढ़ाया और बिना किसी हिचकिचाहट के मेरे होंठों को चूम लिया। उसका चुंबन आदित्य से भी ज्यादा आक्रामक था। उसने मेरी जीभ चूस ली। फिर उसने मुझे पलटकर मेरी ड्रेस उतार दी। मैं नंगी खड़ी थी दोनों के सामने। रोहन ने मेरे चूचों को अपने बड़े हाथों से दबाया। “क्या बोबे हैं भाभी के!” उसने कहा। आदित्य पीछे से आया और उसने मेरी चूत में उँगली डालकर रस निकाला। “देखो रोहन, कितनी गीली है मेरी भाभी की चूत, तुम्हारे लिए तैयार है।” रोहन ने अपनी जींस उतार दी।

उसका लंड आदित्य के लंड से भी मोटा था, पर थोड़ा छोटा। मेरी चूत ने फड़कन की। आदित्य ने मुझे सोफे पर लिटाया। रोहन मेरे ऊपर आ गया। उसने अपने लंड को मेरी चूत के होंठों पर रगड़ा, और फिर एक जोरदार धक्के में पूरा अंदर घुस गया। मैं चीख उठी। वह बहुत तेज़ था। उसने तुरंत तेज़ गति से चुदाई शुरू कर दी। आदित्य मेरे सिर के पास बैठ गया और अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया। “चूस, भाभी, मेरा लंड चूस जब तक यह तेरी चूत चोद रहा है।”

मैं आदित्य का लंड चूसने लगी, जबकि रोहन मेरी चूत चोद रहा था। यह दोहरा आनंद अवर्णनीय था। मेरा शरीर दो तरफ से भर रहा था। रोहन की चुदाई की आवाज़, मेरे मुँह से लंड चूसने की आवाज़, और हम तीनों की सिसकारियाँ मिलकर एक अश्लील सिम्फनी बना रही थीं। रोहन ने मेरी टाँगें उठा लीं और और गहराई से चोदने लगा। “ओह! तेरी चूत में तो आग लगी हुई है!” वह चिल्लाया। मैं उसके लंड पर और तेज़ी से उछलने लगी।

आदित्य ने अपना लंड मेरे मुँह से बाहर निकाला और मेरे चेहरे पर थपथपाया। “अब इसकी बारी है,” उसने कहा, और रोहन से कहा कि वह पीछे हटे। रोहन ने अपना लंड बाहर निकाला, वह पूरी तरह से चमक रहा था मेरे रस से। आदित्य ने मुझे पलटकर घुटनों के बल खड़ा किया। “रोहन, तुम इसके मुँह में अपना लंड डालो। मैं इसकी गांड चोदता हूँ।”

दो लंड और एक चूत का अद्भुत समायोजन

रोहन मेरे सामने आ गया और अपना लंड मेरे मुँह में ठूँस दिया। मैंने उसे चूसना शुरू कर दिया। उसी समय, आदित्य ने वैसलीन लगाकर अपना लंड फिर से मेरी गांड में घुसा दिया। अब मेरा मुँह और मेरी गांड दोनों भरे हुए थे। मैं दो लंडों के बीच फँस चुकी थी। ओरल सेक्स करने के दौरान रोहन मेरे मुँह में जोर-जोर से धकेलने लगा, और आदित्य मेरी गांड मारने लगा। मेरी चूत बीच में रस टपका रही थी, और मेरा शरीर एक अजीबोगरीब आनंद से भर रहा था। मैं महसूस कर रही थी कि मैं पूरी तरह से इस्तेमाल हो रही हूँ, एक ऐसी वस्तु बन गई हूँ जिसका एकमात्र उद्देश्य इन दोनों पुरुषों को संतुष्ट करना है। और मुझे इससे सचमुच प्यार हो गया था।

“मैं निकलने वाला हूँ!” रोहन चोदते हुए जोर से चिल्लाया। उसने अपना लंड मेरे मुँह से बाहर निकाला और अपना गाढ़ा वीर्य मेरे चेहरे और सीने पर छिड़क दिया। गर्म-गर्म माल मेरी त्वचा पर बहने लगा। यह देखकर आदित्य और उत्तेजित हो गया। उसने मेरी गांड और तेज़ी से चोदनी शुरू कर दी। “हाँ! अब मैं भी निकालता हूँ!” आदित्य गुर्राया। उसने भी अपना लंड बाहर निकाला और अपना वीर्य मेरी गांड के छेद और पीठ पर निकाल दिया। मैं थककर फर्श पर गिर पड़ी। मेरा शरीर दोनों के वीर्य से सना हुआ था।

मेरी चूत और गांड दोनों में जलन हो रही थी, पर मैं एक गहरी संतुष्टि महसूस कर रही थी। रोहन ने मुझे अलविदा कहा, और आदित्य ने फिर से मुझे नहलाया। उस रात, जब विशाल घर आया, तो मैं उससे भी सेक्स की माँग कर बैठी। मैं उस समय इतनी उत्तेजित थी कि मुझे हर लंड चाहिए था। विशाल हैरान रह गया, पर उसने मेरी इच्छा पूरी की। पर उसकी साधारण चुदाई में वो मज़ा नहीं था। मेरी चूत अब आदित्य के मोटे लंड की आदी हो चुकी थी।

दिन बीतते गए, और मेरा रिश्ता आदित्य के साथ और भी प्रगाढ़ होता गया। वह अब इंटरव्यू के लिए दूसरे शहर जाने वाला था। उसके जाने से एक दिन पहले, हमने एक अंतिम, अविस्मरणीय चुदाई की। उसने मुझे बाँधकर, आँखों पर पट्टी बाँधकर चोदा। उसने मेरे शरीर के हर हिस्से को चूमा, चाटा और काटा। उसने मेरी चूत और गांड दोनों को इतनी बार चोदा कि मैं गिनती भूल गई। हम दोनों रोए भी, क्योंकि हम जानते थे कि यह शायद आखिरी बार था। उसके जाने के बाद, मेरी ज़िंदगी फिर से पहले जैसी उबाऊ हो गई। पर अब मैं वह पुरानी अनन्या नहीं रही थी। मैं एक ऐसी छिनाल औरत बन चुकी थी जो अपनी कामुकता को जानती थी, और जो जानती थी कि उसकी चूत और गांड किस लिए बनी हैं।

विशाल के साथ मेरे संबंधों में भी कुछ बदलाव आया। मैंने उसे बताया कि मुझे क्या पसंद है। शुरू में वह झिझका, पर फिर उसने भी मेरी इच्छाओं को पूरा करना शुरू किया। हालाँकि, वह कभी भी आदित्य जैसा नहीं बन पाया। पर मैं संतुष्ट थी। कभी-कभी आदित्य फोन करता, और हम सेक्स्टिंग करते। वह मुझे बताता कि वह कैसे मेरी याद में अपना लंड हिलाता है और मुठ मारता है। मैं उसे बताती कि मैं कैसे उसकी याद में अपनी चूत में उँगलियाँ डालकर रस निकालती हूँ। यह रिश्ता एक अलग ही रूप में जारी रहा।


बिना कंडोम के देवर व उसके दोस्त ने गांड चूत दोनों मारी अन्तर्वासना हिंदी सेक्स स्टोरी का निष्कर्ष

Bina condom ke devar aur uske dost ne gaand aur chut dono maari Antarvasna Hindi Threesome Sex Story :- अनन्या भाभी की यह हिंदी सेक्स स्टोरी एक ऐसी औरत की कहानी है जो समाज के बंधनों में घुटती हुई, अपने भीतर की कामुक ज्वाला को पहचानती है और उसे पूरी तरह से प्रज्वलित होने देती है। आदित्य के साथ उसका निषिद्ध संबंध केवल शारीरिक सुख तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसके आत्मविश्वास और स्वाभिमान को एक नया आयाम दिया। उसने सीखा कि उसकी इच्छाएँ, उसकी लालसाएँ गलत नहीं हैं।

यह अन्तर्वासना हिंदी भाभी देवर थ्रीसम 18+ सेक्स स्टोरी पाठकों को एक ऐसी सेक्सी यात्रा पर ले जाती है जहाँ हर मोड़ पर शर्म, हिचकिचाहट और पाबंदियाँ टूटती हैं, और एक नई, स्वतंत्र, कामुक औरत का जन्म होता है। अनन्या अब उस औरत के रूप में जीती है जो अपने शरीर और उसकी इच्छाओं का स्वामी है, न कि समाज की अपेक्षाओं की गुलाम। यह कहानी उन सभी पाठकों के लिए एक दर्पण है जो अपने भीतर के छिनालपन को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, और उसे जीने का साहस रखते हैं।

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