गाँव में लगे नए साल के मेले में भाभी और उसकी सहेली के साथ देसी थ्रीसम अन्तर्वासना हिंदी सेक्स स्टोरी का सारांश :- हरिपुर गाँव में नए साल का मेला लगा था। मैं, राहुल, पिछले एक महीने से वंदना भाभी की चूत के लिए तरस रहा था। वंदना भाभी हमारे पड़ोस में रहती थीं, उनका पति दिनेश एक नंबर का जुआरी और नशेड़ी था, घर में कभी सुख नहीं देते थे। वंदना भाभी की शादी को तीन साल हो गए थे, पर उनकी चूत अभी भी तंग और रसीली थी क्योंकि दिनेश ने शायद ही कभी उन्हें ठोकता था। मैं और वंदना भाभी का अफेयर पिछले साल शुरू हुआ था, जब मैंने खेत में उन्हें नहाते देख लिया था। तब से हम जब भी मौका मिलता, खेतों में या जंगल में चुदाई कर लेते। इस बार नए साल के मेले का बहाना परफेक्ट था। मैंने अपनी दोस्त ममता के जरिए वंदना भाभी को मैसेज भिजवाया कि शाम को मेले में मिलें, नीली साड़ी पहनकर आएँ। वंदना भाभी ने हामी भर दी, लेकिन अकेले आने में डर लग रहा था इसलिए अपनी सबसे करीबी सहेली कविता को साथ ले आईं।
कविता गाँव की सबसे चुदक्कड़ औरत थी, उसके बारे में कहा जाता था कि उसने आधे गाँव के लंड चख लिए थे। मेले में हम तीनों मिले, फिर मेरे दोस्त संदीप के खेत की ओर निकल गए। संदीप ने खेत खाली करवा दिया था। वहाँ घास के ढेर पर पहले मैं और वंदना भाभी ने एक-दूसरे को नंगा किया, लंड चूसाई, चूत चाटी, फिर जोरदार ठुकाई शुरू हुई। कविता छुपकर देख रही थी, फिर वंदना भाभी ने उसे बुला लिया और तीनों ने मिलकर देसी आउटडोर थ्रीसम किया। मैंने दोनों की चूत और गांड मारी, दोनों ने मेरा लंड बारी-बारी और साथ-साथ चूसा। वंदना भाभी की गांड में बिना कंडोम के झड़ गया। उस रात के बाद दोनों मेरी रखैल बन गईं। यह कहानी उसी थ्रीसम की है – भावनाओं से भरी, गंदी और भरपूर चुदाई वाली।
मैं राहुल, 24 साल का जवान लड़का, मजबूत शरीर, 8 इंच का मोटा लंड। वंदना भाभी, 28 साल की शादीशुदा औरत, गोरी, बड़े-बड़े दूध, चौड़ी कमर, रसीली चूत और तंग गांड। उनका पति दिनेश जुआ और शराब में डूबा रहता है, वंदना को कभी सुख नहीं देता। कविता, वंदना की सबसे करीबी सहेली, 30 साल की, काली-कलूटी, भारी गांड, बड़े-बड़े चुचे, चुदक्कड़ स्वभाव, गाँव में कई मर्दों के साथ सो चुकी है। संदीप मेरा दोस्त, जिसका खेत हमने इस्तेमाल किया। यह कहानी मेरी नजर से है – भावनाओं, वासना और बेबाक चुदाई से भरी।
नए साल का मेला हरिपुर गाँव में पूरी धूम से लगा था। रंग-बिरंगे झंडे, लाउडस्पीकर पर गाने, चाट-पकौड़े की महक, चारों तरफ भीड़। लेकिन मेरे दिमाग में सिर्फ वंदना भाभी थीं। पिछले एक महीने से दिनेश के शक की वजह से हम मिल नहीं पाए थे। मेरा लंड हर रात उनकी चूत की याद में हिलता था। मैंने वायग्रा की आधी गोली खा ली थी ताकि आज पूरी रात ठोक सकूँ। नीली साड़ी में वंदना भाभी को देखते ही मेरा लंड धोती में खड़ा हो गया। उनके साथ कविता भी थी, लाल साड़ी में, उसके बड़े-बड़े चुचे ब्लाउज से बाहर झांक रहे थे। मैंने दूर से इशारा किया और संदीप के खेत की तरफ चल दिया। दोनों मेरे पीछे-पीछे आईं। खेत में घास का ढेर था, चारों तरफ अंधेरा और सन्नाटा। मैंने मुड़कर देखा – वंदना भाभी की आँखों में वासना झलक रही थी।
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हम घास के ढेर के पास पहुँचे तो वंदना भाभी ने मुझे गले लगा लिया। उनकी गर्म साँसें मेरे कान पर लग रही थीं। मैंने उनकी साड़ी का पल्लू खींचा, ब्लाउज के बटन खोले। उनके बड़े-बड़े दूध बाहर आ गए। गुलाबी निप्पल पहले से ही कड़े थे। मैंने एक दूध मुँह में लिया, जोर से चूसा। वंदना भाभी की सिसकारी निकल गई – “आह… राहुल… बहुत दिन हो गए…”। मैंने दूसरा दूध भी दबाया, निप्पल को दाँतों से काटा। उनकी साड़ी नीचे सरका दी, पेटीकोट उठाया। कोई पैंटी नहीं थी। उनकी चूत पहले से ही गीली थी, बाल साफ किए हुए थे। मैंने उँगलियाँ अंदर डालीं, वो सिकुड़कर मेरे हाथ पर गिरने लगीं। कविता पास ही खड़ी सब देख रही थी, उसकी साँसें तेज हो रही थीं। मैंने वंदना भाभी को घास पर लिटाया और उनका मुँह अपने लंड की तरफ किया।
वंदना भाभी ने मेरी धोती खोली, लंड बाहर निकाला और प्यार से चूमने लगीं। “कितना मोटा हो गया है तेरा लौड़ा…” वो बोलीं और उसे मुँह में ले लिया। ग्ग्ग… ग्ग्ग… की आवाजें आने लगीं। मैंने उनके बाल पकड़े और मुँह में आगे-पीछे करने लगा। उनका गला तक लंड जा रहा था। मैंने नीचे झुककर उनकी चूत चाटनी शुरू की। उनकी चूत का रस मीठा था, मैं जीभ अंदर तक डाल रहा था। वो मेरे लंड को और जोर से चूस रही थीं। तभी कविता की हल्की हँसी सुनाई दी। हमने मुड़कर देखा – वो पास ही खड़ी हमें देख रही थी, उसका हाथ उसकी साड़ी के अंदर था। वंदना भाभी ने उसे इशारा किया, “आ जा कविता… डर मत… राहुल का लंड बहुत मजा देता है…”। कविता मुस्कुराई और पास आ गई।
वंदना भाभी की रसीली चूत में पहला झटका और कविता की थ्रीसम में एंट्री
कविता ने अपनी साड़ी उतार दी। उसके चुचे वंदना भाभी से भी बड़े थे, गांड तो जैसे दो बड़े तरबूज। वो नंगी होकर हमारे पास लेट गई। मैंने उसका एक चुचा पकड़ा, जोर से दबाया। वो कराही, “आह… कितना जोर से दबाता है रे…”। वंदना भाभी ने मेरा लंड छोड़ा और कविता को दिया। कविता ने लंड को जड़ से चूमना शुरू किया, फिर मुँह में लिया। दोनों औरतें बारी-बारी से मेरा लंड चूस रही थीं। कभी वंदना भाभी, कभी कविता। फिर दोनों ने साथ मिलकर चूसा – एक लंड का सुपाड़ा, दूसरी अंडकोष। मेरे लंड पर दोनों की थूक बह रही थी। मैं स्वर्ग में था। मैंने वंदना भाभी को फिर से लिटाया, कंडोम निकाला और लंड पर चढ़ाया। उनकी टाँगें फैलाईं और एक जोरदार झटका मारा। पूरा लंड उनकी चूत में समा गया। वो चीखीं, “आह… मर गई… राहुल… धीरे…”
मैंने उनकी चूत मारना शुरू किया। हर झटके में उनकी चूत से चपचप की आवाज आ रही थी। उनके दूध उछल रहे थे। मैंने झुककर उन्हें चूसा। कविता पास बैठी अपनी चूत सहला रही थी, उसकी दो उंगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं। मैंने स्पीड बढ़ा दी। वंदना भाभी की मादक सिसकारियाँ चीखों में बदल गईं – “आह… आह… ठोक… और जोर से… मर जा रही हूँ…”। कुछ ही मिनट में उनकी चूत ने झरना छोड़ दिया। वो काँपने लगीं, चूत ने मेरे लंड को जोर से जकड़ लिया। मैं रुका नहीं, और तेज ठोका। फिर लंड निकाला और कविता की तरफ मुड़ा। कविता पहले से ही कुतिया बनकर घास पर घुटनों के बल बैठी थी। उसकी बड़ी गांड ऊँची थी। मैंने उसकी चूत पर थूक लगाई और लंड अंदर सरका दिया। उसकी चूत ढीली थी, लेकिन गर्म और गीली। वो बोली, “वाह राहुल… कितना मोटा है…”
कविता की चूत में लंड पूरा अंदर तक जा रहा था। मैंने उसकी गांड पर जोरदार थप्पड़ मारे, वो चिल्लाई लेकिन आउटडोर चुदाई का मजा ले रही थी। मैंने उसके बाल पकड़े और पीछे से ठुकाई शुरू की। उसके बड़े-बड़े चुचे लटककर हिल रहे थे। वंदना भाभी पास लेटी सब देख रही थीं, उनकी उंगलियाँ फिर अपनी चुदासी चूत में थीं। मैंने कविता को जोर-जोर से ठोका। उसकी चूत से भी आवाजें आने लगीं – चप… चप… चप…। वो बोली, “राहुल… तेरी भाभी सही कहती थी… तेरा लंड तो कमाल है…”। मैंने और स्पीड बढ़ाई। कविता भी झड़ने लगी, उसकी चूत ने मेरे लंड को निचोड़ा। लेकिन वायग्रा का असर था, मेरा लंड अभी भी लोहे जैसा कड़ा था। मैंने लंड निकाला, कंडोम उतारा और वंदना भाभी की तरफ मुड़ा। वो पहले से ही समझ गई थीं।
कविता की ढीली चूत की ठुकाई और वंदना भाभी की गांड मारने की तैयारी
वंदना भाभी कुतिया बनकर घास पर बैठ गईं। उनकी गांड का छेद गुलाबी था। मैंने उस पर थूक लगाई, उंगली से ढीला किया। वो बोलीं, “धीरे डालना राहुल… तेरे लंड से फट जाती है मेरी गांड…”। मैंने लंड का सुपाड़ा छेद पर रखा और धीरे-धीरे अंदर किया। उनकी गांड बहुत तंग थी, लंड मुश्किल से जा रहा था। आखिर पूरा अंदर हो गया। वो चीखीं, “आह… मम्मी… फट गई…”। मैंने धीरे-धीरे आगे-पीछे करना शुरू किया। कुछ देर बाद उनकी गांड ढीली पड़ गई और वो भी मजा लेने लगीं। मैंने स्पीड बढ़ा दी। उनके दूध मैंने आगे से पकड़ लिए और जोर-जोर से ठुकाई करने लगा। कविता पास आ गई, उसने वंदना भाभी के दूध चूसने शुरू कर दिए। तीनों फिर से एक हो गए। मैं वंदना भाभी की गांड मार रहा था, कविता उनके दूध चूस रही थी।
वंदना भाभी की गांड की ठुकाई बहुत दिनों बाद हो रही थी, इसलिए मजा दोगुना था। उनकी गांड मेरे लंड को जकड़ रही थी। मैंने और जोर से झटके मारे। वो चीख रही थीं, “आह… राहुल… आज फाड़ दे मेरी गांड… पूरा अंदर डाल…”। कविता ने मेरे अंडकोष चूसने शुरू कर दिए। मैंने कभी वंदना भाभी की गांड मारी, कभी कविता के मुँह में लंड डाला। दोनों औरतें मेरे लंड की गुलाम बनी हुई थीं। आखिर मेरा झड़ना करीब आ गया। मैंने वंदना भाभी की गांड में ही तेज-तेज झटके मारे और सारा वीर्य उनकी गांड के अंदर छोड़ दिया। गर्म वीर्य की धार उनकी गांड में महसूस हुई। वो भी एक बार फिर झड़ गईं। मैं लंड निकालकर पीछे गिर गया। दोनों औरतें मेरे पास लेट गईं, मेरे सीने पर सिर रखा।
हम तीनों कुछ देर ऐसे ही लेटे रहे। मेले से दूर-दूर तक गाने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन हमें सिर्फ एक-दूसरे की साँसें सुनाई दे रही थीं। वंदना भाभी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “राहुल… आज तूने मुझे सचमुच सुख दे दिया… कविता को साथ लाकर सही किया…”। कविता हँसी, “भाभी, अब तो हम दोनों तेरी रखैल हैं… जब मन करे बुला लेना…”। हमने कपड़े पहने, मेले में थोड़ी देर घूमे और फिर अलग हो गए। उस रात के बाद जिंदगी बदल गई। अब वंदना भाभी और कविता दोनों जब भी मौका मिलता, मेरे पास आ जातीं। कभी खेत में, कभी जंगल में, कभी रात को मेरे घर पर। दोनों की चूत और गांड मेरे लंड की आदी हो गई थीं।
दोनों रंडियों की चूत और गांड की भरपूर ठुकाई और वीर्य की बौछार
उस थ्रीसम के बाद मैं और मजबूत हो गया था। अब मैं दोनों को एक साथ बुलाता। कभी वंदना भाभी को दिन में, कभी कविता को। लेकिन सबसे मजा तब आता जब तीनों मिलते। एक बार फिर संदीप के खेत में हम तीनों पहुँचे। इस बार मैंने कोई कंडोम नहीं लिया। वंदना भाभी बोलीं, “आज बिना कंडोम के चोद… तेरे बच्चे की माँ बन जाऊँगी…”। मैंने पहले कविता को लिटाया, उसकी ढीली चूत में बिना कंडोम लंड डाला और जोर-जोर से ठोका। फिर वंदना भाभी की तंग चूत में। दोनों की गुलाबी चूत से सफेद गाढ़ा वीर्य टपक रहा था। फिर दोनों की गांड मारी डॉगी सेक्स पोजीशन में। गांड मारने के बाद आखिर में दोनों के मुँह में झड़ा और दोनों के मुँह में बीरी भर दिया। वो दोनों मेरे वीर्य को चाट-चाटकर पी गईं। उस दिन के बाद हमारी चुदाई और भी बेबाक हो गई।
समय बीतता गया। वंदना भाभी का नशेड़ी पति दिनेश अभी भी जुए में डूबा रहता है। लेकिन सेक्सी माल, वंदना भाभी अब खुश रहा करती थीं। उनकी बड़ी बड़ी आँखों में चमक आ गई थी। हमारे साथ आउटडोर इंडियन देसी थ्रीसम सेक्स करने के बाद तो कविता भी पहले से ज्यादा चमकने लगी थी। मैं दोनों को भरपूर सुख देता। कभी मेले में, कभी खेत में, कभी नदी किनारे। हमारी थ्रीसम चुदाई गाँव की सबसे गंदी और सबसे मजेदार कहानी बन गई। मैं वंदना भाभी का शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने कविता को उस दिन साथ लाया, वरना मुझे एक नहीं दो-दो रसीली चूतें नसीब न होतीं।
नए साल के मेले में भाभी और उसकी सहेली के साथ देसी थ्रीसम अन्तर्वासना हिंदी 18+ XXX सेक्स स्टोरी का निष्कर्ष
Naye Saal Ke Mele Mein Bhabhi Aur Uski Saheli Ke Saath Desi Threesome Antarvasna Hindi Sex Story :- यह कहानी मेरे लिए सिर्फ चुदाई की नहीं, भावनाओं की भी थी। वंदना भाभी को मैं सचमुच प्यार करता था। उनका दुख देखकर मन करता था कि उन्हें हमेशा सुख दूँ। कविता के आने से हमारा रिश्ता और मजबूत हुआ। दोनों औरतें अब मेरी जिंदगी का हिस्सा थीं। मैंने उन्हें वो सुख दिया जो उनके पति नहीं दे सके। वंदना भाभी अब पहले से ज्यादा खुश और आत्मविश्वास से भरी थीं। कविता भी अब कम बाहर भटकती थी। हम तीनों का रिश्ता गुप्त लेकिन गहरा था।
यह इंडियन देसी थ्रीसम सिर्फ शरीर का मिलन नहीं, दिल का भी था। मैंने सीखा कि सच्चा सुख देने में है। अब भी जब नए साल का मेला लगता है, हम तीनों उस खेत में जाते हैं और पुरानी यादें ताजा करते हैं। मित्रों, आपको गाँव की यह देसी थ्रीसम चुदाई कहानी कैसी लगी? कमेंट करके जरूर बताएं। आपकी राय से हमें और बेहतर कहानियाँ लिखने की प्रेरणा मिलती है। अगर आप भी अपनी कोई सच्ची कहानी शेयर करना चाहते हैं, तो बेझिझक लिख भेजें। धन्यवाद।


